29 November 2010

.....और फिर ढिशुम.. ढिशुम...

पुलिस चाहे लाख अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन  उसे एक बात तो माननी पड़ेगी की रात में शराबियों की वजह से आम लोगों का जीना मुहाल है. एक दिलचस्प वाकया  परसों रात हुआ. मैं एअरपोर्ट से लौटकर प्रेस क्लब होते हुए घर लौट रहा था. पुलिस कंट्रोल रूम से थोड़ी दूर पर दो शराबी एक सज्जन की कार को रोक कर खड़े थे, कार मालिक को वो लोग लगातार गलियां भी बके जा रहे थे. आदतन मैं रुका. दोनों अपनी अपनी सफाई मुझे देने लगे. आपको जान कर आश्चर्य होगा की कार मालिक आखिर था कौन? शराबियों की गाली गलौच से कार मालिक और उनका परिवार कार के अन्दर डरा सहमा बैठा हुआ था. मैं कार मालिक को अच्छे से पहचान गया था. मुझे देखकर कार मालिक भी थोड़ा राहत महसूस कर रहा था.
कार मालिक और दोनों शराबी थाने जाने की जिद पर अड़े हुए थे. मैंने शराबियों को समझाया की जो हो गया सो हो गया. अब अपनी गाडी उठाओ और घर जाओ. शराबी लगातार फोन करके अपने कुछ साथियों को बुलाने की कोशिश कर रहे थे. मैंने कार मालिक से कहा की आप भाभी और बालक को घर छोड़ कर थाने आ जाइए. मैं इन शराबियों को लेकर थाने आ रहा हूँ. शराबी कार का नंबर नोट करने लगे तो मैंने भी. बाईक का नंबर नोट कर लिया. शराबियों की बाईक   का नंबर था- सी जी ०४ सी यु ४८४६ . कार का नंबर ३९९९ था. शराबियों की गाली गलौच सुनकर मुझे भी गुस्सा आने लगा था. कार के अन्दर भाभी और बच्चों की हालत देखकर लग रहा था की आखिर की क्या करूँ इन शराबियों के साथ . कार मालिक कार लेकर थाने की तरफ चले गये और मैं पैदल शराबियों के पीछे चलने लगा. अचानक कार मालिक एक सिपाही के साथ बाईक में आये और शराबियों से फिर बात की और पूछना चाहा की गलती  आखिर थी किसकी? अब तो शराबी आपे से बाहर हो रहे थे . मैंने बीच बचाव के उद्देश्य से शराबियों को फिर समझाया की मामला ख़त्म करो नहीं तो लम्बे से निपट जाओगे. मेरा इतना कहना था की एक शराबी मुझसे और दूसरा कार मालिक से भीड़ गया. अब हमारी बारी थी. दोनों ने ढिशुम ढिशुम जो शुरू किया तो शराबी होश में आने लगे. थोड़ी देर में कुछ रंगरूट भी अपनी बाईक से वहां पहुँच गये . इन रंगरूटों ने मुझे तो पहचान लिया पर कार मालिक को नहीं पहचान पाए. उन लोगों ने अपनी बाईक में शराबियों को बैठाया और मैंने कार मालिक को. शराबी जैसे थाने पहुंचे उनके तो होश फाख्ता हो गये. सब लोग कार चालक को सलाम ठोंकने लगे. फिर शराबियों को भी बताया गया की कार चालक आखिर हैं कौन? कार चालक अवकाश लेकर फिल्मों में काम कर रहे सी एस पी शशिमोहन थे. कभी शराबी और गुंडे उनके नाम से कांपते थे और आज फ़िल्मी मेकप के कारण कोई उन्हें पहचान नहीं पाया. मामला तो यहीं ख़त्म हो गया पर इससे दो बात तो साफ़ हो गयी, एक अब शशिमोहन को वापस अपनी नौकरी ज्वाइन कर लेना चाहिए और रायपुर पुलिस  को भी ये बात माँ  लेनी चाहिए की रात में शहर में परिवार लेकर घूमना खतरे से ख़ाली नहीं है.

25 November 2010

जिंदा हूँ मैं......

समय जो ना कराये कम है. मुझे आदेश मिला सबसे दूर रहने का और मैंने स्वीकार कर लिया. इस बीच कई तरह के चुतियापों और ज़िंदगी की सीख से रूबरू होने का मौका मिला मुझे. इस बीच कहाँ रहा और क्या क्या किया. इसकी झलक इन छायाचित्रों में देखें. इस छत्तीसगढ़ी फिल्म का नाम है " इही जिनगी हे.." बाकी बातें अब लगातार ब्लॉग पर होती ही रहेंगी, शंकरी नहीं रही पर मैं जिंदा हूँ और कोशिश करूँगा की आप लोगों का प्यार और स्नेह पहले की तरह मिलेगा. इसी आशा और विश्वास के साथ आपको अपनी यादो के कुछ छायाचित्रों के साथ छोड़े जा रहा हूँ.. पर याद  रखना ........

07 September 2010

पाकिस्तान से आकर सबको खरीदने चला था कब होगा देश निकाला भावनदास का

पाकिस्तान से आकर वैसे तो 720 लोग छत्तीसगढ़ में बस गए हैं। नियम विपरित सबने अपने मकान भी खरीद लिए और कईयों ने तो एक मंत्री की शह पर अपना भारतीय मतदाता परिचय पत्र भी बनवा लिया है। पाकिस्तान से आने वालों में शामिल भावनदास सचेदवा ने भी न सिर्फ एक भारतीय परिवार को सडक़ पर ला दिया बल्कि उल्टी-सीधी और नियम विपरीत हरकतों के कारण एक साल बाद ये मामला पुलिस ने दर्ज किया है। भावनदास पैसों के बल पर सबको खरीद लेना चाहता था, लेकिन कागजातों के खेल ने उसे उलझा दिया और अब वह अपनी गिरफ्तारी से बचने भागता फिर रहा है। 13 जुलाई 2010 को भावनदास का वीजा खत्म हो गया था, इसके बाद भी पुलिस के कुछ अफसरों के कारण उसका देशनिकला नहीं किया जा सका। पुलिस यह दलील देकर मामले को टरकाती रही कि उसने वीजा की मियाद बढ़ाने की दरख्वास्त जमा करा दी है। भावनदास सचदेव ने जब एक भारतीय परिवार को एक व्यवसाय में तंग करना शुरु किया तब इस पूरे मामले का भंडाफोड़ हुआ।
अमलीडीह निवासी चंद्रप्रकाश मंधनानी अपने परिवार के साथ एक कुटीर उद्योग का संचालन कर रहे थे। फेयर एण्ड फेयर एवर क्रीम का उत्पादन वे जड़ी बूटियों को कूट पीस कर करते थे। जब चंद्रप्रकाश का व्यवसाय चलने लगा तो भावनदास की नजर इस व्यवसाय पर पड़ गई। भावनदास ने इससे मिलते-जुलते नाम का एक नया उत्पाद सिलकिन फेयर एन फेयर एवर क्रीम का उत्पादन करना शुरु कर दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। खाद्य एवं औषधि विभाग से भावनदास ने चंद्रप्रकाश के उत्पाद में अपना पंजीयन भी करवा लिया। चंद्रप्रकाश का यह छोटा सा कुटीर उद्योग जब बैठने लगा और उनकी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी तब शुरु हुआ शिकायतों का दौर। चंद्रप्रकाश का परिवार दर-दर भटकता रहा लेकिन भावनदास पैसों के प्रभाव के कारण सब जगह हावी होने लगा था। जब उन्हें कहीं न्याय नहीं मिला तो वे मीडिया से भी कई बार रु-ब-रू हुए कहीं उन्हें जगह मिली तो कहीं भावनदास ने वहां भी खबरें रुकवाई।
इसी बीच चंद्रप्रकाश ने करो या मरो की कसम खाई और भिड़ गए भावनदास के पीछे। एक तो धंधा चौपट, आर्थिक तंगी और ऊपर से भावनदास का जलवा। समय पलटा और भावनदास के खिलाफ राजेन्द्र नगर पुलिस ने एक मामला दर्ज कर लिया। भारतीय रिजर्व बैंक का स्पष्ट निर्देश है कि कोई भी पाकिस्तानी नागरिक बिना रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना भारत में अंचल संपत्ति का हस्तांतरण अथवा अधिग्रहण नहीं कर सकेगा। इसके बावजूद भावनदास ने विधानसभा मार्ग में एक जमीन खरीदा, वहीं मकान बनवाया और अमलीडीह में भी एक मकान खरीदा। इन जगहों पर बाकायदा अपने नाम से विद्युत कनेक्शन भी लिया। अपनी इस कारगुजारी को छिपाने के लिए उसने अपने बेटे महेन्द्र कुमार सचदेव को इस मकान का स्वामी बताकर अपने आपको किरायेदार बताते हुए एक शपथ पत्र भी तैयार करवा लिया। अपने कुल बच्चों को लेकर भी उसने कई बार भारतीय नोटरियों को झूठी जानकारी दी। राजेन्द्र नगर पुलिस ने भावनदास के विरुद्ध मामला दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी की कवायद तेज कर दी है। खाद्य एवं अैाषधि विभाग भी इसी आधार पर भावनदास के उत्पाद का पंजीयन निरस्त करने की राह देख रहा है। जिला पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा ने इस मामले में सख्ती बरती है। अब देखना है भारतीय नियमावली के तहत भावनदास का देशनिकाला कब तक हो पाता है।

शकुनी मामा और महतारी

आम तौर पर मुंबई के लोग बाहर काम करने तब निकलते हैं जब मुंबई में उन्हें कोई पूछता नहीं है. शकुनी मामा भी कई दिन से ख़ाली थे, रायपुर का एक धूर उनके सम्पर्क में आया तो शकुनी मामा ने तत्काल बिसात बिछा दी. हिंदी फिल्म "मैं तुलसी तेरे आँगन की" और "उपकार" देखकर उसे मिलाकर एक छत्तीसगढ़ी फिल्म " महतारी" की योजना बनाई और पहुँच गये कवर्धा. छत्तीसगढ़ी लोग उनकी भाषा सुनकर बेहोश हो रहे हैं. शकुनी मामा ना तो हिंदी बोल रहे हैं ना छत्तीसगढ़ी, और ना ही भोजपुरी. अब जब फिल्म रिलीज़ होगी तब पता चलेगा की फिल्म बनाने का मकसद आखिर क्या था? तीन-तीन हीरोइन  भी आयीं  हैं मुंबई से. खैर... छत्तीसगढ़ के फ़िल्मकार भी भेडचाल के शिकार हैं. अभी तक तो सब ठीक ठाक चल रहा है. आगे पता नहीं क्या होने वाला है.

18 August 2010

बंद होने के लिए फिर शुरू हुआ "हिन्दुस्तान"

राजनीति में चम्मच शब्द का प्रयोग बहुत सुना था, अब तो इन चम्मचों ने पत्रकारिता का रुख कर लिया है. मैं बात कर रहा हूँ "हिन्दुस्तान" की. नेशनल लुक , डोल्फिन स्कूल और हिन्दुस्तान के मालिक राजेश शर्मा ने फिर अपने चंगु की बात मानते हुए लोकल केबल पर " हिंदुस्तान " का प्रसारण शुरू कर दिया है. इस बार मंगू ने राजेश शर्मा का साथ देने की बजाय उससे दूरी बनाना ज्यादा बेहतर समझा. चंगु अभी जिस पद  पर बने रहने का दावा कर रहा है, वो पद तीन साल पहले ही  समाप्त हो गया है, वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों को भी अब ये समझ आ गया है की चंगु दरअसल ज़मीन का दलाल और ट्रांसपोर्टर है. अभी एक मामले में मेरे निवेदन पर वो थाने तक आये लेकिन तत्काल उसका गुणगान करना शुरू कर दिया. मेरा एक पुराना वारंट था, मैं थाने गया और थानेदार मुझे जानता नहीं था , इसीलिये वरिष्ठ पुलिस अधिकारीयों की मदद लेने के अलावा मैंने अपने शुभचिंतकों को भी थाने बुलवा लिया था, काम दो मिनट का था, लेकिन समय खराब हो तो मामला लम्बा खिंच सकता था. इसी डर से मैं सारे लोगों के  संपर्क में रहा.  दो दिन बाद पता चला की चंगु ने राजेश शर्मा को जाकर बताया की आज मैंने अह्फाज़ को जेल जाने से बचा लिया. आपको उससे डरने की ज़रुरत नहीं है. हिन्दुस्तान चालू करो. बाकी मैं हूँ ना. ध्रितराष्ट्र फिर जाग गया. बिना पंजीयन के हिन्दुस्तान फिर शुरू हो गया है. मैंने भी जोर लगा दिया है की फर्जी चैनल और फर्जी लोग मीडिया को नहीं चाहिए. सरकार की लुंज - पुंज कार्यप्रणाली ने कई बार मुझे हतोत्साहित किया. इस बार तो कोर्ट में बुलवाऊंगा सबको. इनकम टैक्स वाले भी अपने स्तर पर खोज बीन कर ही रहे हैं. मुंबई तक फाइल जा चुकी है. 
चम्मचों के बल पर क्या कोई काम किया जा सकता है? अब चंगु की भूमिका सबको समझ में आ गयी है. वो अब co-ordinator हो गया है. कोई भी काम उससे करवा लो . मुख्यमंत्री से मिलना हो, रजिस्ट्री करानी हो, बस चाहिए या और कुछ भी, चंगु को एक ऐसा पद दे दो जिससे उसे अच्छे पैसे भी मिलें और प्रतिष्ठा भी रहे. राजेश शर्मा ने दे दीया . प्रेस क्लब की राजनीति अब नेशनल लुक से नहीं चलेगी. सारे लोग बौराए हुए हैं. खेल पत्रकार संघ बन गया . अब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग भी अलग हो रहे हैं , सबने ये भी प्रण किया है की अपना घर ( प्रेस क्लब ) नहीं छोड़ेंगे. अब आर पार की लड़ाई का आगाज़ हो चुका है.

नत्था को आगे काम न मिला तो मैं बनाऊंगा पीपली डी- लाइव


ज़िंदगी के एक सिरे को पकड़ो तो दूसरा निकल जाता है. इसी कश्मकश में रचनात्मकता धरी की धरी रह जाती और समय पंख लगाकर उड़ता चला जाता है. कई साल बाद फिर ऐसा मौका आया जब फिल्म के नाम पर हम सारे पत्रकार दोस्त फिर जमा हुए और देख आये पीपली लाइव. सम सामयिक विषय पर एक गंभीर लेकिन हल्की फुल्की फिल्म. इस फिल्म को देखकर फिल्म बनाने वालों के सारे गणित फेल हो गये हैं. पीपली ने साबित कर दिया की फिल्म चलाने के लिए एक विषय वस्तु तो चाहिए ही. हिंदी फिल्मों की सी डी देखकर और स्पोट में लैपटॉप लगाकर फिल्म का frame चुराकर छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वालों को एक बड़ी सीख देकर जायेगा पीपली. छत्तीसगढ़ के नत्था को पूरे देश ने अभी सर पर उठ लिया है.कल नत्था वापस अपने गाँव आ गया. रायपुर एअरपोर्ट से कल एक गाड़ी उसे सुपेला तक छोड़ आयी. माना विमानतल पर नत्था से बात करते समय मैं उसके मन् को पढने की कोशिश कर रहा था. उसके अन्दर भी एक भूचाल आया हुआ था की अब कल क्या होगा? मैंने उसे  आश्वस्त किया है की अगर आगे कुछ बहुत अच्छा नहीं हुआ तो मैं तुम पर एक फिल्म बनाऊंगा और उसका नाम रखूँगा. पीपली डी लाइव . डी लाइव में लाइव नहीं होता. हम कैसेट में रिकॉर्ड कर उसे स्टूडियो लाकर लाइव जैसा ट्रीट करते हैं. नत्था को कांसेप्ट पसंद आ गया और वो थोड़ा नोर्मल दिखा . सामान्य चेहरे मोहरे वालों पर बॉलीवुड दो- तीन साल में एक ना एक फिल्म बनाता ही है. हमारा दुर्भाग्य है की हम छत्तीसगढ़ में रहते है लेकिन यहीं के लोगों की विशेषताओं से अपरिचित हैं. एक छत्तीसगढ़ी फिल्म "किस्मत " में नत्था को पीपली बनने के पहले एक छोटा सा रोल दिया गया था. लोगों को अब समझ आ रहा है की नत्था को बड़ा रोल भी दिया जा सकता था. दिल्ली -६ में "ससुराल गोंदा फूल" बजा तो हमें समझ आया की इसे तो अपन भी अपनी फिल्म में ले सकते हैं. अब बारी पीपली के  "चोला माटी के राम" की हो रही है. कल जब "चना के दार राजा" भी कोई उठा लेगा तब हमें लगेगा, की अरे ये गाना तो हमारे यहाँ का था.
सवाल ये उठ रहा है की मीडिया आखिर कर क्या रहा है? कल मीडिया ने नत्था को highlight क्यों नहीं किया. आज वो क्यों उसके पीछे भाग रहा है. कल फिर सब जैसे थे वाली position में आ जायेंगे. पीपली में स्वर्गीय हबीब तनवीर की टीम के कई पुराने कलाकार भी दिखे. पुराने लोगों ने कई और हिंदी फिल्मों में भी काम किया है. रामचरण निर्मलकर ने bendit queen में दस्यु सुंदरी फूलन के पिता का रोल निभाया था. आज उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है. बीच में अपने पैरों की तकलीफ लेकर  संस्कृति मंत्री के घर आये रामचरण को मैंने पहचाना था , और उन्हें अस्पताल ले जाकर admit कराया था. सरकार को भी कलाकारों का सुध लेने की फिक्र नहीं है. अब तो रोयल्टी के लिए भी लोग बिना कागजी हथियार के खड़े होने लगे हैं. छत्तीसगढ़ के गीतकार तो मीना कुमारी की गुम हुई  डायरी की तरह हो गये हैं. छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों को अब अपनी दशा और दिशा बदलनी होगी. हिंदी फिल्मों की कॉपी करने की बजाय उन्हें छत्तीसगढ़ की अच्छाइयों को तलाशना होगा . मेहनत करनी होगी. एक पहल तो मैंने भी कर दी है. साल भर से एक ही विषय पर काम कर रहा था. अब जाकर एक निर्माता इस फिल्म के लिए राजी हो गया है. अब मुझे मौका मिला है कुछ कर दिखाने का. ऊपर वाले की मेहरबानी रही तो हम ब्लॉग पर सतत संपर्क में तो रहेंगे ही .       

24 July 2010

"छत्तीसगढ़ की बेटी " भी अब जायेगी defence corrospondentce course में



रायपुर की कुमारी संगीता गुप्ता ने साबित कर दिया है देश में चाहे जो भी स्थिति हो, लेकिन छत्तीसगढ़ में महिलाएं पीछे नहीं हैं. अपनी काबिलियत के आधार उसने आवेदन भरा और देश के ३४प्रतिष्ठित चैनल और उसके पत्रकारों के बीच उसे भी जगह मिल गयी. छत्तीसगढ़ के लिए ये गौरव की बात है की संगीता ऐसी पहली प्रतिभागी है जिसे यहाँ से डिफेन्स corrospondents course में शामिल होने का मौका मिल गया.मीडिया हाउस और मेरा सौभाग्य बस इतना है की संगीता की दौड़भाग में उसके घर वालों के साथ सहभागी रहे.
मूलतः रायपुर निवासी संगीता की पढाई- लिखाई यूँ तो दिल्ली में हुई, लेकिन आज भी वो अपने आपको छत्तीसगढ़ की बेटी ही मानती है. उसके पिता आज भी दिल्ली में हैं लेकिन उसके संघर्ष में माता जी साथ में हैं. दिल्ली में आई. बी. एन. से internship करने के बाद  रीजनल न्यूज़ चैनल वाच न्यूज़ से रायपुर में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाली संगीता के मन् में कुछ नया करने की चाह थी, जब वोईस ऑफ़ इंडिया में मेरी उससे मुलाक़ात हुई तभी उसके इरादे भांप गया था मैं. आम तौर पर लड़कियों को कई मामलों में मैंने भागते देखा है. संगीता के मन् में कुछ सीखने की लगन थी, वो साबित कर देना चाहती थी, की वो आज नहीं तो कल कुछ ना कुछ कर दिखायेगी. आज भी वो यही कहती है की अभी तो सिर्फ शुरुआत है. मंजिल दूर है. वाच टी. वी. बंद होने के बाद से बेरोजगार बैठे कुछ ख़ाली दिमाग पत्रकारों ने उसे मेरे विरुद्ध बरगलाया भी और कई रास्ते भी दिखलाये. उसने किसी की एक ना सुनी और मुझसे मेरे अनुभवों का लाभ लेते हुए छायांकन, विडियो सम्पादन, फिल्म का प्रारंभिक ढांचा बनाना, और अच्छी स्क्रिप्ट लिखना सीख ही गयी.बहरहाल १६ अगस्त २०१० से १७ सितम्बर २०१० तक ये corrospondents course सेना की विभिन्न इकाइयों में शुरू हो जायेगा. अपनी इस सफलता का श्रेय वो अपने पिता श्री अरविन्द गुप्ता और माता श्रीमती कमला देवी को देती है. वर्तमान में कुमारी संगीता गुप्ता , मीडिया हाउस की managing director है. दिल्ली, मुंबई, उत्तरप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मीडिया हाउस की कई शाखाएं निरंतर कार्यरत हैं. आप भी इस नवोदित प्रतिभा का उत्साह वर्धन करें.

16 July 2010

पुलिस वाला चोरहा अउ चोर हा पुलिस बने हे..

मैं बार बार कहता और लिखता रहा हूँ की छत्तीसगढ़ी दर्शकों को मूर्ख मत समझो. लेकिन लोग हैं की मेरी बात मानते ही नहीं. आज अपना भाग्य आजमाने एक और छत्तीसगढ़ी फिल्म " मया दे दे मयारू" रिलीज़ हो रही है. सबको इस फिल्म से उम्मीदें हैं. सतीश जैन की एक और फिल्म " टूरा रिक्शावाला "  ने सफलता के नए झंडे गाड़ दिए हैं. अब प्रेम चंद्राकर की फिल्म  "मया दे दे मयारू" को भी इससे ही कुछ उम्मीद है. इस फिल्म की कई खासियतें हैं. पहली ख़ास बात ये है की इस फिल्म में एक रियल पुलिस अधिकारी रील लाइफ में नज़र आएगा. अधिकारी भी कोई चना मुर्रा नहीं एक धाकड़ पुलिस वाला है. रायपुर शहर में गुंडे इस अधिकारी का नाम सुनते ही दुबक जाते थे. शशिमोहन नाम है इस अधिकारी का. ३० मार्च २०१० तक इस अधिकारी ने बीमारी के नाम से छुट्टी ली और कई नाटक और एक फिल्म में काम किया है. रायपुर से मुंबई जाकर रह रहे एक हिट कलाकार संजय बत्रा भी इस फिल्म में एक सटीक किरदार निभा रहे हैं. इस फिल्म के प्रचार के लिए सभी हथकंडे अपनाए गये हैं. अब देखना है की दर्शकों का कितना प्यार इस फिल्म को मिलेगा. इस फिल्म को हिट करने के लिए दिल्ली-६ में इस्तेमाल हो चुका एक " गाना सास गारी देवे " को ममता चंद्राकर ने आवाज़ दी है. ये दुर्भाग्य है की जब कोई हमारी संस्कृति को मुंबई में बैठकर झाँक लेता है तब हमें समझ आता है की अरे.. ये तो हमारा कल्चर था. छत्तीसगढ़ी मर्म को समझने वाले प्रेम चंद्राकर ने निःसंदेह अपनी खासियत इस फिल्म में भी बनाये रखी है. एक -दो नंबर के लिए संघर्ष कर रहे अनुज भी इस फिल्म में हीरो हैं. अपने हर किरदार में जान डालने की क्षमता रखने वाले पुष्पेन्द्र सिंह भी एक विलेन  के रूप में इस फिल्म में अपनी छाप छोड़ेंगे. वाहन और ज़मीन से जुड़े अलक राय ने ये फिल्म produce की है. इस फिल्म को अभी देखा नहीं गया है लेकिन पुलिस  के एक जवान को एक बात बिलकुल नागवार गुजरी है की उनके साहब ( कंठी ठेठवार )  फिल्म में न्याय मांगने के लिए डायलोग बाजी कर रहे हैं और एक मंत्री का भाई उसमें इंस्पेक्टर बना है. उसने पोस्टर देखा और समीक्षा कर दी की " पुलिस वाला चोरहा अउ चोर हा पुलिस बने हे. नई चलही पिक्चर ......" ऐसे सीधे और बेबाक हैं छत्तीसगढ़ के लोग. मुझे तो बैठे बैठाये heading मिल गयी.  खैर ...फिल्म तो आज लग गयी है. सोमवार तक बॉक्स ऑफिस अपना पिटारा खोल देगा. लेकिन ये फिल्म चलनी चाहिए. एक पुलिस वाला जब रोल कर सकता है तो क्या एक मंत्री के भाई को अभिनय करने का अधिकार नहीं है. वो भी तो कलाकार है, अब निजी ज़िंदगी को रुपहले परदे पर तुलना करना गलत है. एक हफ्ते बाद पता चलेगा फिल्म चली या नहीं चली . चली तो किन विशेषताओं के कारण , और नहीं चली तो कौन से ऐसे कारण थे जिसे प्रेम चंद्राकर के सहायक निर्देशक समझ नहीं पाए. मेरी व्यक्तिगत शुभकामनाएं " मया दे दे मयारू" की पूरी टीम के साथ है.

14 July 2010

छत्तीसगढ़ी फिल्मों की शुरुआत करने वाले कन्हैया पंजवानी नहीं रहे..


ज अल सुबह ६.३९ पर एक एस एम् एस मिला. श्याम चावला का एस एम् एस था. लिखा था कन्हैया पंजवानी की अंतिम यात्रा आज ११ बजे उनके निवास से राजेंद्र नगर श्मशान के लिए रवाना होगी. एस एम् एस पढ़ते ही मन् अजीब सी खामोशी  में डूब गया. मैं अकेले रोते रोते सोचने लगा की अब हमारे कामों की अच्छाइयां और बुराइयाँ कौन निकालेगा. समय के साथ अपनी पहचान खोते रायपुर या छत्तीसगढ़ के लोग जीते जी कन्हैया भैया  की विशेषताएं जान ही नहीं पाए. अब पता नहीं क्यूँ लगने लगा है की कुछ काम धाम करने की बजाय मौत का इंतज़ार करना बेहतर है. पहले कीर्ति आयंगार को कन्धा दे आये, हाल ही में प्रदीप पोद्दार को और अब कन्हैया भैया . ईश्वर के न्याय पर अब संदेह होने लगा है. कन्हैया भैया के पिता पूरी तरह से टूट गये हैं. मैं बाकी लोगों की नहीं जानता पर इतना ज़रूर जानता हूँ की मेरी हर गतिविधि पर उनकी नज़र रहती थी. मैं खुद ही उन्हें बुलाकर अपना नया क्रिएशन दिखा दिया करता था.
  आज मन् में बड़ी हलचल है. कल दिन भर भी अजीब सी बेचैनी में गुज़रा. संदेह था की कुछ गड़बड़ होने वाला है और हो ही गया. अब हमें छूट गलियां देकर हमारी तारीफ करने वाली आवाज़ आज खो गयी. संघर्ष करते करते शायद थक गये थे कन्हैया भैया. पैरालिसीस  का attack पड़ने के बाद मैं भी पहली बार उन्हें इस हालत में देखकर शायद इतना डर गया था की दोबारा उनकी तबियत तक पूछने नहीं गया. वो बोल नहीं पाते थे बहुत कुछ कह देना चाहते थे. उनको देखकर लौटा तो कई बार रोया. उनके स्वास्थ्य की  ख़बरें तो मिलती रहती पर मैं उन्हें दोबारा देखने का साहस नहीं जुटा पाया. आज तो जाना ही होगा. वो नहीं बोलेंगे ना? कोई बात नहीं . बुरा समय एक और नासूर देकर गया ना?
  हौसला ना तो किसी के बोलने से बढ़ता ना कम होता.उसे अन्दर से ही कहीं जगाना होता है. जगायेंगे.. और क्या करेंगे. काम के मामले में समझौता नहीं करने की हिदायत हमें उन्होंने ही दी थी. जो काम अच्छा है उसे अच्छा और जो बुरा है वो बुरा कहना भी उन्होंने ही हमें सिखाया और इस आदत का खामियाजा खुद भी भुगतते रहे और हमें भी ऐसा ही बना दिया. आज अपने या अपने काम के बारे में कौन बुरा सुनना चाहता है. लोग तो बस भाग रहे हैं. छत्तीसगढ़ की पहली वीडियो फिल्म " जय माँ बम्लेश्वरी" का छायांकन और सम्पादन कन्हैया भैया ने ही किया था. उस दौर में सिर्फ वी एच  एस था. और उस पैटर्न  में एडिट करना बड़ा कठिन काम था. उस समय की सुपर डुपर हिट फिल्म देने के बाद भी वो एकदम सामान्य  रहे.  फिर हमारे साथ उन्होंने मध्यप्रदेश की पहली वीडियो न्यूज़ मैगजीन " जनऊला " का सम्पादन किया. जब छत्तीसगढ़ी फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो कन्हैया भैया ने भी बतौर producer " तुलसी - चौरा" का निर्माण किया. स्क्रिप्ट के समय कुछ सीन और कुछ मुद्दों को लेकर मेरा उनसे विवाद हो गया. मैंने उनसे बातचीत बंद कर दी. बाद  में एक दिन वो घर आये और मुझे समझाकर तुलसी - चौरा के पोस्ट production के लिए राजी किया. जब फिल्म नहीं  चली  तो  फिर एक दिन घर आये और कहा की जिस सीन और मुद्दों पर तुने आपत्ति जताई थी , वो वाजीब थी.  
  ऐसे थे कन्हैया भैया. इस बीच कुछ लोग उनके सफ़ेद बाल का इस्तेमाल करने लगे थे . कुछ भी अंड बंड करने की बजाय वो ख़ाली रहना पसंद करते थे. हमें भी यही सीख दी. मै उम्र में उनसे कम से कम २० साल छोटा हूँ पर किसी भी फिल्म, सीन या एल्बम पर वो मुझे खुलकर सुनते थे. उन्हें मेरे साथ और मुझे उनके साथ काम करने में खूब मज़ा आता था.ढेर सारे कीससे हैं जो अब कसक बनकर चुभते रहेंगे. आज से सब मज़ा ख़त्म. अब खुद बनाओ ,खुद समीक्षा करो, खुद देखो. हमारी इसीलिये भी पटती थी , क्योंकि जो उन्हें अच्छा नहीं लगता था वो मुझे भी कभी  अच्छा नहीं लगा.  और जो मुझे अच्छा लगा वो भी उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे. विचारों में समानता हमारी खासियत थी. आज सब ख़त्म हो गया. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और हमारी भी आर ए सी क्लीयर करे. आमीन . 

11 July 2010

ऐसा नहीं था मैं..- दुर्योधन

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ईरा फिल्म के साथ मिलकर एक नयी हिंदी फिल्म "सुयोधन" की शुरुआत हमने की है. महाभारत अपने कई चरित्रों के कारण चर्चित रहा है. महाभारत में  दुर्योधन के द्वंद्व को हम एक हिंदी फिल्म की शक्ल  में उतार रहे हैं. हो सकता है विवाद की स्थिति बने या हो सकता है हमें समर्थन भी मिले. इसी उहापोह के बीच पूरी शिद्दत से मैंने और अमित जैन ने इस फिल्म पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया है. आप  क्या सोचते हैं , कृपया सुझाव ज़रूर दें. इसकी स्क्रिप्ट हम तैयार कर रहे  हैं लेकिन डायलोग का ज़िम्मा होगा आप सभी पर.. बस.. थोड़ा सा इंतज़ार..प्रोमो आपके सामने है..... क्या आप भी दुर्योधन के इस द्वंद्व में उनके साथ हैं?  

07 July 2010

एड्स का खतरा छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी...

 खिर वही हुआ, जिसका डर था. छत्तीसगढ़ी फिल्मों से जुड़े एक निर्माता को एड्स हो ही गया. इस निर्माता के घर वालों ने अपनी संतुष्टि के लिए कई और पैथोलोजी लैब में परीक्षण करवाया. अफ़सोस की बात ये रही की सभी जगह उनका एच . आई. वी. पाजीटिव ही निकला .अब इस निर्माता से जुड़े लोग इस बात का पता लगाने जुटे हैं की ये बीमारी आखिर यहाँ आयी कैसे? इसी डर से उस निर्माता को अब तक इसकी जानकारी भी नहीं दी गयी है.


अब सवाल ये खड़े हो रहे हैं की मुंबई से आने के एक हफ्ते बाद अचानक इस निर्माता की तबियत क्यों खराब हुई. एक समारोह के बाद जब उनकी तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ी तो घर वालों ने चिकित्सकीय सलाह ली और तुरंत उनकी रक्त जांच करवाई गयी. जब एक प्रतिष्ठित लैब ने उन्हें एच आई. वी. की पुष्टि की तो घर वाले दहल गये. आनन् फानन में कई और लैब में उनका रक्त जंचवाया गया. सभी ने एक सुर में इस निर्माता को एड्स रोगी करार दिया. घर वाले समझ नहीं पा रहे हैं की इस बीमारी ने उनके शरीर में जगह कहाँ बनाई. मुंबई में या रायपुर में? इस चक्कर में निर्माता के आसपास रहने वाले उन नायिकाओं पर संदेह कर रहे हैं, जिनके संपर्क में ये निर्माता रायपुर और मुंबई में संपर्क में रहा. घर वाले चाहते हैं की यदि इस बात की पुष्टि जल्द से जल्द हो जाये तो उन नायिकाओं को छोलिवूड से दूर रखा जाये. जब मुझे इस बात की जानकारी लगी तो मैंने खुद इस निर्माता से जुड़े लोगों से बात की. 


घर वालों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है की ना तो ये बात वो लोग हजम कर पा रहे हैं ना उलटी कर पा रहे हैं. शैलेन्द्र नगर के आसपास भी फिल्मों के निर्माण को लेकर काफी नायिकाओं का आना जाना लगा रहता है. आसपास के कई फार्म हाउस और कुछ प्रतिष्ठित होटल में भी नायिकाओं को ठहराया जाता है. अब निर्माता के घर वालों को हर नायिका पर संदेह हो रहा है. इसमें ज्यादा संदेह उन नायिकाओं पर किया जा रहा है, जो स्ट्रगल करने मुंबई गयीं और वापस रायपुर में आकर काम कर रही हैं. काम की तलाश और आस में निर्माताओं के चक्कर लगाने कुछ संदिग्ध छत्तीसगढ़ी  नायिकाएँ भी संदेह के दायरे में हैं.  अब घर वालों की चिंता ये है की इतनी बड़ी बात छुपायें तो छुपायें कैसे? 


जो होना था वो हो चुका है. अब घर वाले गुपचुप तरीके से इस निर्माता के उपचार की विधियाँ ढूंढ रहे हैं. ईश्वर उनका साथ दे बाकी लोग जो असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाने में जुटे हैं उन्हें अब अपनी ये आदत बदलनी ही होगी. दूसरी पारी में जब छत्तीसगढ़ी फ़िल्में एक नया आयाम छूने की कोशिश कर रहीं हैं, ऐसे में एक गंभीर और ला इलाज बीमारी का पदार्पण एक दुःख भरी खबर है. एक तरह से छत्तीसगढ़ी फिल्म से जुड़े लोग सकते में हैं. संदेह का ठीकरा उन हीरोइनों पर भी फूट सकता है, जिन्हें या तो लगातार काम मिल रहा है या जो काम के सिलसिले में कहीं भी जाने को तैयार रहती हैं. समय आने दीजिये आप को भी पता चल जायेगा की ये निर्माता आखिर है कौन? अपनी तो ना किसी से दोस्ती ना किसी से बैर वाला रोल है. खबर थी, सो आप लोगों के साथ शेयर कर लिया. और हाँ ये खबर १०० प्रतिशत सच है ना. पैथोलाजी  लैब का प्रमाण-पत्र देख आया हूँ मैं. हे ईश्वर अब तू ही बचा हमारे लोगों को. ताकि वो तेरी आराधना में कमी ना करें. 

30 June 2010

well done नक्सलियों...good job?

           ( लहू- लुहान घटना स्थल पर जवानों के रक्त और जूते..)              
    ( घटना -स्थल से ट्रैक्टर और बाद में सेना के विमान से भेजे गये शव)
    ( इसी रास्ते के उपयोग से जवानों को मदद  मिली)
                                                                          क्या बात है..... कल फिर २7 सी आर पी ऍफ़ के जवानों को तुम लोगों ने शहीद कर दिया. छत्तीसगढ़ की जनता भी तो सीधी सादी है ना. और सबसे सीधे हैं हमारे मुख्यमंत्री. और उनसे भी  लाख गुना सीधे हैं हमारे गृह मंत्री. पूरी दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ता. फिर पहुँच जायेंगे दिल्ली १३ करोड़ मांगने. इतना करोड़ तो आ गया. कहाँ गया?
    मुझे एक बात नक्सलियों से सीधे सीधे पूछनी है की क्या पुलिस के जवानों को मारने से आ जायेगा उनका राज्य? अरे हमला उन पर करो जो तुम्हारे कथित राज के आड़े आते हैं. ये जवान तो अपने बीवी बच्चों को छोड़कर नौकरी के लिए आते हैं. कई नक्सली भी तो इस हमले में मारे गये हैं. उनकी लाशें देखकर तरस नहीं आता. जवानों के बीवी बच्चों पर भी तरस नहीं आता तुम लोगों को. कौन सा इन्कलाब ला दोगे. अपने उद्देश्यों से भटक गये हो तुम लोग. काहे का माओवाद? घंटे का? मुझे पता है तुम लोगों का शहरी नेटवर्क भी बहुत तगड़ा है. हमारे कुछ दलाल साथी भी तुम लोगों से मिले हुए हैं. उनके भी बीवी बच्चे हैं याद रखना. पत्रकारिता का चोला ओढ़ लेने से आत्मा नहीं मर जाती. मर भी गयी होगी तो एक दिन जागना होगा उसे. 
    wel done की heading इसीलिये लगाया ताकि तुम में से कोई इसे  पढ़े और एक बार चिंतन करे. देखो अपना कुछ नहीं जायेगा. अपन तो बिंदास लिखते हैं और ऐसे ही मर जाना  चाहते हैं. मुझे पता है की  तुम लोग बहुत  अच्छा काम कर रहे हो. तुम लोगों के ही कारण नेशनल चैनलों में छत्तीसगढ़ को जगह मिल पाती है , नहीं तो कौन पूछता है छत्तीसगढ़ को. तुम लोगों के कारण ही राज्य सरकार को केंद्र सरकार से  करोड़ों रुपये मिल रहे हैं. तुम लोगों  की भी तो जमकर वसूली की शिकायतें हैं. कुल मिलाकर सब का धंधा बढ़िया चल रहा है. तुम लोगों के कारण छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का साथ बी जे पी को मिला हुआ है.  अच्छा है सब खाओ खुजाओ, बत्ती बुझाओ. तुम लोग तो भगवान् को भी नहीं मानते ना? मैं मानता हूँ और भगवान् की शक्ति भी साक्षात देखी है मैंने. एक बात का आश्वासन मैं तुम लोगों को ज़रूर दे सकता हूँ की ये सरकार तुम लोगों के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाकर अपना धंधा बंद नहीं करेगी. जो सरकार अपने व्यापारी भाइयों से उनके मजदूरों को मुफ्त चावल देकर उनका धंधा चौपट कर सकती है. वो सरकार कुछ भी कर सकती है, पर तुम लोगों के आड़े कभी नहीं आयेगी सरकार .तुम लोगों के कारण ही तो कई होटलें इंडिया के बाहर खड़ी हो गयी हैं.  तुम लोगों का ही आशीर्वाद पाकर कई छगन  और राजीव अग्रवाल पैदा हुए और जी रहे हैं.  बाबूलाल जैसे लोगों को भी गले से लगाकर रखती है हमारी सरकार. अभी  कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे अमित जोगी ने भी तो तुम लोगों के इलाकों में जाकर सत्याग्रह किया. तब कहाँ थे तुम लोग. खैर अन्दर की बात मुझे पता है.  हमारी सरकार को नपुंसक मत समझना. ऐसा नहीं है  की हमारी सरकार के पास कोई दमदार गृहमंत्री नहीं है. पर बाकी लोग थोड़ा होशियार हैं इसीलिये काम चला रही है सरकार. हमारे गृह मंत्री को हमेशा जवानों की गलती ही नज़र आती है. शकल से ही ऐसे दिखते हैं की  सबको दया आ जाती है. नैतिकता के नाम पर भी वो कभी इस्तीफे की पहल नहीं करेंगे. कभी कभी लगता है की उनको इस्तीफे की भी मनाही है और खुद गृह मंत्री बंदियों जैसा जीवन जी रहे हैं.अब कांग्रेस अपनी   परंपरा निभाएगी. पुतला वुतला जला देंगे. बस हो गया विरोध. सब गुड गाड चल रहा है. पर मेरी एक विनती सुनोगे? बंद कर दो ये नरसंहार...मानव जीवन पाए हो तो किसी का उद्धार करो. अगले जनम में पता नहीं बस्तर हो ना हो. वहां नक्सलवाद हो ना हो....? 

27 June 2010

हैदराबाद में होगा फैसला - ब्यूरो चीफ की दादागिरी ,शराब ने कराई किरकिरी

भगवान ने जब हवा बनाई होगी तब सोचा होगा की इस हवा का इस्तेमाल लोग सही दिशा में करेंगे. पर आजकल हवा का इस्तेमाल कुछ और हो रहा है. अब मुफ्त की शराबखोरी ने हैदराबाद से जुड़े एक रीजनल चैनल के ब्यूरो को मुश्किल में डाल दिया है. एक नेशनल चैनल ने तो बाकायदा ये खबर भी दिखाई. तेलीबांधा रायपुर के नशेमन बार में चार दिन पहले ये सब हुआ. गृह मंत्री के निर्देश पर आबकारी विभाग का एक दस्ता बार की जांच के लिए पहुंचा तो ब्यूरो वहां बैठकर पी रहा था. जैसे ही दस्ता हरकत में आया,  ब्यूरो को गुस्सा आ गया. नशे में उसने खुद को इस बार का पार्टनर बताया और कवरेज करने गयी एक टीम को चमकाने लगा. थोड़ी देर में उसके चैनल का रिपोर्टर भी वहां कवरेज के लिए पहुंचा. बस ब्यूरो ने उससे आई डी चीनी और बरस पड़ा आबकारी अमले पर.. एक महिला अफसर को खरीदने की कोशिश भी बार के मालिक ने की. अब गृह विभाग इस पूरे मामले की सी डी देख रहा है, कुछ लोग दबी जुबां से यह भी कह रहे हैं की मुख्यमंत्री के खिलाफ लगातार खबर दिखाने के कारण इस ब्यूरो को फंसाया जा सकता है. अभी ये तय नहीं हो पाया है की उस ब्यूरो  के खिलाफ क्या कार्यवाही की जाये. अभी अभी खबर  मिली है की ब्यूरो को हैदराबाद बुला लिया गया है. बताते हैं की कुछ अन्य शिकायतें भी ब्यूरो के खिलाफ मिली हैं. ऐसा होता है समय का फेर जो नहीं समझता है उसे हैदराबाद मुख्यालय में बुलाकर सब समझा दिया जाता है.ये तो नियती का खेल है.  इस मामले में ब्यूरो को समझाया भी जा सकता है. हे भगवान हवा का दुरूपयोग होने से रोको.

18 June 2010

लो अब हम भगवान् हो गये...
अनिल पुसदकर और मुझे लोग भगवान् मानने लग गये. ऐसा क्यों ? अरे भाई , आदमी भगवान को ही तो कोसता है. विवादित पत्रकार ज़रीन सिद्दीकी की धर्मपत्नी हम दोनों को कोसती फिर रही है. देख लेने तक की बात कह रही है. हमारे खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस लेने तक की धमकी भी दे रही है. उसका गुस्सा जायज़ है. वो एक ऐसे पति की पत्नी है, जिसने एक घर भी नहीं छोड़ा. जबकि डायन भी कई घर छोडती है,  बुरे वक्त में इंसान पूजा पाठ में समय बिताता है, उधारी करते नहीं फिरता. आज हर आदमी उसे ढूंढ रहा है. सबको पैसे लेने हैं उससे. अब साढ़े तीन लाख रुपये चिंटू से लेते वक्त उसे हम लोगों की याद नहीं आयी?  हम सिर्फ चिंटू का पैसा वापस दिलाने और अन्दर की बात सार्वजनिक ना होने देने लिए संघर्ष कर रहे थे. पर आज तो लग रहा है जैसे हमने हवन करके हाथ जला लिए. ये दुर्भाग्य है पत्रकारिता का की ऐसे लोग भी फील्ड में आ गये हैं जो अब बीबी के कन्धों का भी सहारा लेने लगे.
ज़रीन की बीवी का आरोप है की हमारे कारण उसे रायपुर में उसे कोई चैनल वाला नहीं रख रहा है. हम दोनों नोटरी वाले वकील तो नहीं हैं जो उसे एक एफिडेविद दे कर उसे पाक साफ़ कर दें. अपनी करनी खुद भुगत रहा है वो. जब ज़रीन सहारा के नाम से वसूली करने चिचोला गया था , तो क्या हमें बताकर गया था? आमानाका के थानेदार और दुनिया भर में जब वो लोगों से पैसे मांगता फिर रहा था, तब कहाँ थे हम लोग? से हिंदुस्तान में अनिल भैय्या ने उस पर दया की थी.  अजीब लोग हैं भाई. साले करें खुद और भुगतें हम . उसकी बीवी का एक आरोप गंभीर है की हमारे कारण उसे कहीं नौकरी नहीं मिल रही है इसीलिये वो घर छोड़कर कहीं चला गया है. कहाँ  जायेगा? कहीं ना कहीं से फिर वसूली की शिकायत आएगी तो फिर वापस आ जायेगा, अब कान पकड़ता हूँ . भाड़ में जाये सब. नेकी करके अब  और दरिया में नहीं डालना है.
आई. डी. नहीं तो काम नहीं
अच्छा खासा times  now के लिए काम कर रहा था , लेकिन नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को ये बात बहुत दिन से खटक रही थी. अब उनकी आत्मा को ठंडक मिली होगी. times now के हेड ऑफिस मुंबई गया और साफ़ साफ़ कह आया- तीन साढ़े तीन साल हो गये. अब आई.डी. के बिना काम नहीं करूँगा. मेरे भोपाल के बॉस राहुल सिंह को इसी मौके की तलाश थी. बात बात पर आई मीन .. आई मीन ....कहकर अंग्रेज़ी बोलने वाले राहुल ने चौथी बार मेरी जगह किसी और को स्ट्रिंगर बनाने की कवायद तेज़ कर दी. अब मैं विरोध नहीं करने वाला . जो चाहे अब times  now  के लिए काम करे . अभी तक मेरे कारण कई लोगों ने यहाँ काम करने से इनकार किया . लेकिन अब मैं खुद राहुल सिंह को बाहर से सपोर्ट कर रहा हूँ की वो अब यहाँ किसी और को appoint कर ले. जब तक मैं रहा हर बड़ी खबर बराबरी से ब्रेक हुई. अब मेरा जी उचट गया. मुझे अच्छे माहौल में काम करने की आदत है. अंग्रेज़ी नहीं जानता ऐसा नहीं है. राहुल से ज्यादा अच्छी अंग्रेज़ी बोल लेता हूँ, पर राहुल को नहीं पता की मैं आखिर हूँ कौन? मैं अपने लिए अपनी ज़मीन खुद तैयार करने वाला विशुद्ध श्रमजीवी हूँ. बाप के नाम की ना खाया और ना अब सोच सकता. उनका ऋण ना चुका सकता ना ऐसा करने की सोचता . अपने बाप के नाम पर पत्रकारिता में टिके रहने वालों में से नहीं हूँ मैं.
दरअसल हो ये रहा था की मैं यहाँ से कोई खबर मुंबई बताता तो राहुल के पेट में ऐंठन हो जाती थी. कई बार भोपाल में कोई खबर  बताई तो एक घंटे बाद मुझे गाली सुननी पडी.  मुंबई वाले कहते रहे की इतनी बड़ी खबर सीधे बता देनी चाहिए थी. राहुल को seriousaly news sense नहीं है. उसका सारा ध्यान दौरे और बिल में रहता है. और मुझे देखिये- तीन साल से अपना बिल नहीं भेजा और लाखों रुपये laps हो गये.  मार्च एंडिंग में बिल नहीं भेजा.  अब भुगत रहा हूँ. इस साल  का अब तक का बिल तो भेजूंगा और भुगतान ना हुआ तो देखेंगे ईश्वर की मर्जी क्या है. दिल्ली मुंबई और भोपाल में बैठकर पत्रकारिता करने वाले लोग पता नहीं अपने आपको समझते क्या हैं. अरे हम छोटे राज्य में हैं तो क्या हुआ. हमारी भी तो भावनाएं हैं. राहुल को अब खुला challenge है. मैं तो पत्रकारिता करूँगा और मुंबई में ही रहकर करूँगा. तब क्या करेगा राहुल?. दरअसल आम आदमी छोटी छोटी सी होशियारी में अपने अन्दर ही अन्दर निपटता रहता है. मैंने तो बुरे दिन काट कर अपना ट्रैक ही बदल दिया. लोग बोलते रहें की दिखता नहीं , जब दिखता था तो क्या भला कर दिए मेरा.  एक तो छोटा सा राज्य ऊपर से मालिकों का दबाव. हम सिर्फ गाली खाने के लिए पैदा थोड़ी हुए हैं.
पूरे छत्तीसगढ़ की हर बड़ी खबर की फीड के लिए तत्पर रहता था मैं, पर रायपुर के गिरोहबाज पत्रकारों को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उन्हें शायद पता नहीं या बोडीबाजी के चक्कर में वो भूल गये की साधू और शेर अकेले ही चलते हैं.
 अभी तक पूरे छत्तीसगढ़ में times now ने संवाददाता नहीं बनाये हैं. मैं  अपने दम पर सब जगह से फीड पहुंचवा दिया करता था. अब देखते हैं की नक्सलियों से जुड़े विवादास्पद पत्रकार राहुल  को कितनी मदद करते हैं. वैसे बड़ा चैनल है रीजनल के भी बहुत सारे पत्रकार इच्छुक हो सकते हैं. मुझे बुरा इस बात का लगा की आज तक जो राहुल और मुंबई का स्टाफ मेरी तारीफ़ के पुल बांधते नहीं थकता था, वही लोग राहुल के कहने पर टेढ़े कैसे हो गये  है?.  राहुल अब बोलने लगा है की मैं ठीक आदमी नहीं हूँ. उसके कहने - बकने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं इसीलिये पत्रकारिता में नहीं हूँ की आज  पत्रकारिता छोडूंगा तो कल पुलिस मुझे उठा  ले जायेगी या लोग मुझे नमस्ते करना बंद कर देंगे या मंथली लिफ़ाफ़े मिलने बंद हो जायेंगे. . रायपुर के लोग और मेरे ब्लोगर मित्र जानते हैं की मैं क्या हूँ और कैसा हूँ. मुझे जो अच्छा  लगता है मैं करता हूँ. छोटा सा पेट है, भर जाता है. रायपुर के पत्रकार साथियों को मेरी एक बात नहीं पचती की ये साला फिल्म भी बना लेता है .  छत्तीसगढ़ी एल्बम भी कर लेता है. फिल्मों में डबिंग भी कर आता है. गाना भी गा आता है. ( नक्सलियों पर केन्द्रित और सुनील शेट्टी अभिनीत रेड एलर्ट में कुनाल गांजावाला ने जो शीर्षक गीत हिंदी में गाया है, उसका छत्तीसगढ़ी  वर्जन मैं गा आया हूँ. ये फिल्म जल्द ही छत्तीसगढ़ में  रिलीज होने वाली है और अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर नाम कमा चुकी है ) खैर.. अब लगने लगा है की मुंबई मुझे फिर बुला रहा है. मुझे शायद आदेश हो गया है की अब बड़ा सोचो और बड़ा करो. ये लोग पत्रकारिता से नाम और पैसा काम चुके , अब इनका पेट भर गया है इसीलिये राजनीति कर रहे हैं..... करो .. यही करो. पर सच कहूँ तो times now  छोड़ने का अब रत्ती भर दर्द नहीं है. जिस गली जाना नहीं उसका पता क्या पूछना. अपना बिल क्लीयर कर लूँ, फिर मैं चला मुंबई.
जीवन जो थोड़ा बहुत बचा है उसे भी सार्थक  कामों में लगाना है. मुझे पता है जो लीक से हटकर काम करना, भूखे प्यासे रहना जान जाता है और सबके हित की सोचता है उसे कलयुग में दुःख तो झेलना ही पड़ेगा, राहुल के माध्यम से ईश्वर ने मुझे एक नयी राह दिखाई है. रायपुर  में अगर रहना भी पड़ा तो एक बार फिर ये बात साबित कर दूंगा की मेरे अन्दर का पत्रकार कितना तगड़ा है. मुबई गया तो वहां भी मेरी पूरानी टीम बाहें फैलाकर मेरा स्वागत करने को तैयार बैठी है. बुरा वक्त सबका आता है, अच्छा  वक्त आने में भी समय नहीं लगता. बाय बाय times now ..........

16 June 2010

न टाइम , न टुडे , सब हैं बुझे बुझे
अभी कुछ दिन पहले ही मुझे टाइम टुडे के मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सम्पादक ने आग्रह किया था की आप कुछ समय हमारे लिए भी निकालें, मैंने साफ़ कहा था की यार तुम्हारे चैनल में वज़न नहीं दिखता. सम्पादक रिजवान ने कहा था की नया चैनल है,  धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा. कुछ संयुक्त कोशिशें हमने की भी.  मैंने साफ़ कहा था की मैं आपके संबंधों के आधार पर ख़बरें ऍफ़ टी पी से भेज दिया करूँगा. क्योंकि मुझे पता था की आर्थिक तंगी से जूझ रहा है चैनल.  चार दिन बाद पता चला की पूरे स्टाफ ने हड़ताल कर दी और श्रम विभाग में शिकायत भी दर्ज करा दी. एक आदमी रायपुर में बच गया. उसे एक महीने की सेलरी देकर ब्यूरो चीफ बना दिया गया.  बिना कैमरा मेन के क्या करेगा ब्यूरो? ले दे के काम बढ़ने लगा. मुझसे पूछा गया की आप अब किस तरह की मदद करेंगे? मैंने कहा की जैसा रिजवान बोलें, क्योंकि आप लोगों को मैं जानता नहीं.  बाद में विवाद बढ़ा और चैनल ने यहाँ के कर्मचारियों के खिलाफ स्क्रोल चला दिया की इन लोगों को चैनल से निकाल दिया गया है. अब मेरा दिमाग ठनका, पर चूँकि मेरा कोई लेना देना था नहीं, इसीलिये चुप हो गया.
पर कितने दिन चुप बैठता ? टाइम टुडे की खुदाई की तो पता चला की ये चैनल भी अवैध है. इसका पंजीयन तो पवित्र टी वी के नाम से है. पवित्र टी वी अचानक टाइम टुडे कैसे हो गया? . इनके एंकर भी एक से एक नमूने हैं. बीच में मेरा फोन हुआ तो एक एंकर मुझसे पूछ बैठी की नक्सलवाद  से निपटने के पी एस गिल को क्या बुलाएगी छत्तीसगढ़ सरकार? मैं लाइव में तो शांत रहा पर बाद में अपने ऊपर खूब हंसी आयी. तीन साल पहले के पी एस गिल यहाँ से लौट चुके हैं और ये पूछ रही है की कब आयेंगे के पी एस गिल? गलती नयी लड़कियों की कतई नहीं है. उन्हें थोड़ा बहुत तो बता देते. कुछ तो सिखा समझा देते.  दरअसल मूर्खों की कमी नहीं है. एक एंकर तो अमीन सयानी की विडियो में कॉपी कर रहा है. बाकी दो भी सीखने की कोशिश कर रहे हैं. एक एंकर तो न्यूज़ पढ़ती है तो लगता है जैसे बच्चों का कोई नया चैनल शुरू हुआ है. एक तो इतना हंसती है की लगता है उसे रोज़ सेलरी मिल रही है. खैर.. सीखना सबको चाहिए., पर ये सारे प्रयोग चैनल शुरू होने के पहले हो जाने चाहिए. भोपाल का पहला satelite चैनल है. शुरू में गर्व हुआ, पर धीरे धीरे हवा निकलनी शुरू हो गयी,  आपसी खींचतान में ये चैनल भी बैठता दिखाई दे रहा है.
अब खबर आ रही है की चैनल की आई डी बेचीं जा रही है. ठीक तो है. कहीं से  तो पैसा आना  चाहिए.सब तो यही कर रहे हैं. दिल्ली और भोपाल में बैठे लोगों को शायद इस बात की जानकारी नहीं है की वे खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं.  आज की पत्रकारिता को ऐसे ही लोगों ने आर टी ओ की नौकरी जैसा बना दिया है, अब आदमी आई डी खरीदेगा तो पहले उसका खर्चा निकलेगा. पत्रकारिता कब करेगा वो. खैर..धीमे स्क्रोल वाली पट्टी और धीमी गति से शुरू हुआ ये चैनल पता नहीं स्पीड कब पकड़ेगा. आसार तो कहीं से भी नज़र नहीं आ रहे हैं. अभी तक लीज लाइन बिछ जानी चाहिए थी. मोबाईल पर कब तक टिके रहेगा चैनल? redymade chroma का background और जुगाड़ के एक दो background म्यूजिक से चैनल की असलियत साफ़ साफ़ दिखने लगती है. शकल  सूरत तो भगवान् की देंन होती हैं पर उसे और बिगाड़ कर या उसमें घटिया या खुद make -up कर उसे वीभत्स करने से तो रोका ही जा सकता है. जेब में तनख्वाह के पैसे नहीं होते तो एंकर और कैमरा मेन का काम पूरी चुगली अकेले ही करने के लिए पर्याप्त है. तनख्वाह की हालत सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही  नहीं  सभी जगह से शिकायतें हैं. ऐसे लोग  पत्रकारिता को समझते क्या हैं.आपसी खुन्नस छोड़कर अगर सब इस चैनल को नहीं संभालेंगे तो ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होकर रहेगी. मैं मदद करने आगे आया था लेकिन आप स्टाफ को सेलरी नहीं दोगे तो हम तो लड़ने वालों का ही साथ देंगे ना?
आज़ादी  से पहले लगेगा हिन्दुस्तान में ताला......
....बड़ा अजीब लग रहा होगा ना ये हेडिंग पढ़कर..?  लेकिन मैं साफ़ कर दूँ की ताला हमारे भारत में नहीं., हिंदुस्तान न्यूज़ में लग रहा है.  हिंदुस्तान न्यूज़ के मालिक यानि राजेश शर्मा जिसे कुछ लोगों ने धृतराष्ट्र बनाकर रखा था, उनकी आँख खुल गयी है.  उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिन्दुस्तान की एक बैठक में इस बात की घोषणा कर दी है. आठ  जुलाई २०१०  से यानि आज़ादी की ६३वी सालगिरह के दिन से   हिंदुस्तान  न्यूज़ में ताला लगा दिया जायेगा. सौभाग्य इस बात का भी है की मुझे भी उनकी आँख खोलने का श्रेय है. एक दिन मेरे एक अभिन्न मित्र नितिन चौबे का मोबाइल पर कॉल आया, उसने कहा की राजेश शर्मा तुझसे  मिलना चाहते हैं. मैंने पूछा क्यों? जवाब नहीं आया लेकिन उसने कहा की मेरी बात तुझे माननी ही होगी. इसके पहले भी कई लोगों ने मुझे सलाह दी थी की एक बार राजेश शर्मा से मिल लो. मैं क्यों मिलूं किसी से ? मैं अपनी अकड़ पर कायम था.
हम चार लोग सवा दो घंटे उनके साथ बैठे. दो घंटे तो मैं ही बोलता रहा. बोलता क्या रहा, पूछता रहा हिन्दुस्तान  न्यूज़ के आवक जावक के बारे में. सारे जवाब शून्य रहे. उस दिन मैंने क्लीयर भी कर किया की क्या मैं आपको या आप मुझे जानते हैं? जवाब आया नहीं. मैंने उनसे चैनल से जुड़े कई ऐसे सवाल पूछे जिसके जवाब ना तो उनके पास थे ना ही उनके चंगु मंगुओं के पास. उस दिन मैं भी समझ गया और राजेश शर्मा भी समझ गये की पत्रकारों के एक गिरोह ने उन्हें घेर रखा है,  ये गिरोह ज़मीन दलाली भी करता है, बस भी चलाता है, और हाँ गिरोह के कुछ सदस्य मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों के यहाँ का काम कमीशन पर करते हैं. पत्रकारिता से इनका अब कोई लेना - देना नहीं है. राजेश शर्मा को को देर से ही सही लेकिन ये माजरा  समझते देर ना लगी. वो जिस स्टाफ के लिए अपनी बीमारियाँ बढ़ा रहे थे,  उन लोगों को इस सबसे कोई मतलब ही नहीं था. वो सब मिलकर अपना अपना उल्लू सीधा कर रहे थे.
...जैसे ही ही ये खबर लीक हुई की मैं नितिन और राजेश शर्मा के कुछ घरेलु सदस्य आपस में बात कर रहे हैं. नेशनल लुक के संपादक यानि स्वम्भू चाणक्य प्रशांत शर्मा और प्रबंधक नवीन जैन तत्काल वहां पहुँच गये पर इसके पहले सारी बात मैंने प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी थी. राजेश शर्मा ने उन्हें कल्टी कर मुझे लगातार बोलने का मौका दिया. दुसरे दिन जब ये खबर जब चंगु मंगू को लगी तो उन्हें अपनी कमजोरी छुपाने का मौका मिल गया. चंगु -मंगू इस बात पर राजेशा शर्मा से नाराज़ हो गये की जब वे उनकी मदद  कर रहे थे तो फिर अह्फाज़ को क्यों बुलाया सेठ ने. बस इसी बहाने ने राजेश शर्मा के कान खड़े कर दिए. दरअसल चंगु- मंगुओं ने धृतराष्ट्र बना दिया था राजेश शर्मा को. खुद संजय बनकर आधी अधूरी और अपनी कहानी बताने आ जाते और चले जाते.  दरअसल चैनल के नाम पर राजेश शर्मा से ख़ाली पैसा ले रहे थे चंगु मंगू. काम कुछ नहीं अब जो काम आता नहीं उसे कैसे भी कैसे बेचारे.. खैर.. हिंदुस्तान न्यूज़ के लोग अब अपनी रोजी रोटी के किये नए सिरे से प्रयास कर रहे हैं.

12 May 2010

ब्लॉग ने दिखा ही दी ताकत , टूट गयी हिंदुस्तान की हिमाकत

एक बार फिर साबित हो गया की सत्य की हमेशा जीत होती है, तमाम ब्लोगेर्स की मदद से आखिरकार एक और जीत हासिल हुई हिंदुस्तान न्यूज़ के पत्रकारों को। बड़ी-बड़ी बात करने वालों को आखिर झुकना पड़ा और हड़ताली कर्मचारियों की 'ससम्मान' वापसी संभव हो ही गयी। कैसे हो गये हैं आज कल के पत्रकार ? मैं चार दिन से ब्लॉग नहीं लिख पा रहा था, टाइम टुडे की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते करते तीन दिन बीत गया, एक आश्चर्य जनक बात ये है की हिन्दुस्तान न्यूज़ में लौटने के बाद वहां के किसी पत्रकार ने मुझे किसी भी माध्यान से ये नहीं बताया की उनकी वापसी हो गयी है। तीन दिन पहले जब श्रम विभाग के दफ्तर में सभी ने मुझे फोन करके बुलाया था। श्रम आयुक्त ने वहीँ बताया था की आज सबको पारिश्रमिक के लिए बुलाया जायेगा, सब जाना और अपना अब तक का हिसाब बराबर कर लेना , श्रम विभाग की कागजी कार्यवाही तो चलती रहेगी। यहीं उन्होंने सुझाव दिया की अगर प्रबंधन आप लोगों को वापस लेना  चाहे तो क्या करोगे? मैंने ही कहा था की चुपचाप लौट जाना। काम करने में कोई दिक्कत थोड़े ही है। दिक्कत है रेजा कुली टाइप भुगतान की। अगर वो लोग सेलरी बेस पर रखने को तैयार हैं तो लौट जाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। खैर॥ सब काम पर लौट गये हैं। ब्लॉग लिख लिख कर मैंने और पढ़ पढ़ कर आप लोगों ने जो वातावरण तैयार किया उसके लिए आप सभी का आभारी हूँ।
एक बात जो मुझे अन्दर तक चुभ गयी वो ये इन हडताली कर्मचारियों के सामने अनिल पुसदकर ने मेरे बारे में की बातें झूठ कहीं। अनिल पुसदकर ने उनसे कहा की अह्फाज़ खुद यहाँ आना चाहता था, इसीलिये ये हड़ताल करवाई। अब आप खुद सोचिये की times now जैसा अंतर्राष्ट्रीय चैनल छोड़कर ३४ मोहल्ले में दिखने वाले चैनल में में मेरी क्या रूचि हो सकती है। हड़ताल इसीलिये हुई क्योंकि खुद प्रेस क्लब के कथित अध्यक्ष ने दिहाड़ी व्यवस्था वहां लागू करवाई थी, खुद शोषण पर उतर आये थे। मैंने तो सिर्फ ब्लॉग के माध्यम से पत्रकारों की पीड़ा को सामने रखा था। अब तो आप मुझे रोज़ एक स्पेशल स्टोरी के साथ रीजनल चैनल टाइम टुडे पर भी देख सकते हैं। टाइम टुडे ने मुझे वरिष्ठता के आधार पर senior -corrospondent बनाया है, शहीदों के शव को चीर घर वापस भिजवाने और शहीदों के शव घर नहीं पहुंचे और सी एम् हाउस में जश्न वाली खबर कवर करके अपने आपको साबित किया है। आज भी रायपुर के सभापति को जेल में मोबाइल पर बात करने वाली खबर भी मैंने ही कवर की और बाँट दिया। अपनी कुंठा अनिल पुसदकर ने मुझ पर ठोंक दी। मुंह से पत्रकारिता नहीं होती। आप तो श्रम विभाग , विधुत विभाग और आयकर विभाग को निपटाने वाले थे, निपटा लेते, यहाँ तो बाप का राज है, पूरा छत्तीसगढ़ राज्य प्रेस क्लब जैसा थोड़े ही है, तीनों विभाग अपनी अड़ी में  तो आ गये तो आप लोग तो भाग जाओगे , भुगतेगा राजेश शर्मा। 
मुझे पता है की काम कहाँ करना है और कैसे करना है. लौट कर जाने वालों को अनिल पुसदकर ने एक और बड़ा झूठ बोलकर बरगलाने की कोशिश की है. अनिल पुसदकर ने उनसे कहा की मीडिया हॉउस बंद हो गया है. भास्कर छोड़ने के बाद नवीन शर्मा ने ही मीडिया हॉउस की संरचना तैयार की थी. और मैंने  ( अनिल पुसदकर ने ) नवीन को हरिभूमि ज्वाइन करवा दिया है. नवीन मैं और मधु काम से काम दस घंटे साथ में रहे हैं. ब्रम्हावीर ने नवीन को हरिभूमि के लिए राजी किया और उसीने नवीन के लिए रास्ते बनाया. अनिल पुसदकर का कहीं कोई रोल नहीं था. आप लोग चाहें तो नवीन से ०९४२५२१३०९८ पर बात करके सत्यता का पता लगा सकते हैं. रही बात मीडिया हॉउस बंद होने की तो आप टाइम टुडे से भी इसे जोड़कर देख सकते हैं हम पूरी ताकत से टाइम टुडे की टी आर पी बढ़ने में जुटे हुए हैं. हमारी वेब साईट का मुआयना भी कर सकते हैं. एक बात का खुलासा मैं और कर दूँ. दो -दो चैनल का मुखिया बनना अनिल पुसदकर की कुंठा का प्रतीक है, उन्हें अच्छे से पता है की जब ३ साल पहले प्रेस क्लब के चुनाव हो रहे थे तब वो किसी अखबार में नहीं थे. प्रशांत शर्मा ने झटपट अम्बिकवानी  के संपादक को सेट किया और एक appointment लिखवा लिया अनिल पुसदकर के नाम. आज तक उनकी कोई खबर आप लोगों ने नहीं पढ़ी होगी कई लोग तो नाम भी नहीं जानते होंगे इस अखबार का. और बस फर्जीवाडा जो शुरू हुआ तो आज तक चला आ रहा है. पर झूठ मुझे पसंद  नहीं है. अपना अपना काम करो. मस्त रहो..

09 May 2010

कवि-पुलिस विश्वरंजन को गुस्सा क्यों आता है?

छत्तीसगढ़ के लोग उनकी तुलना माननीय अटल बिहारी बाजपेयी और डोक्टर रमन सिंह से करने लगे हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग तो उनकी तारीफ करते नहीं थकते। तीनों में समानता क्या है आपको बताऊँ? तीनों की बाईट काटने में एडिटर के पसीने छूट जाते हैं। आज बीजापुर में हुई वारदात के बाद बहुत गुस्से में दिखे कवि और पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन। पत्रकारों को भी खूब लताड़ा। एक बात तो उन्होंने पते की कही की जिसको जिस चीज़ का नोलेज नहीं है, वो उसी मामले का विशेषग्य बना बैठा है। अब वो ये बात गृह मंत्री ननकी राम कँवर के लिए बोले या पत्रकारों के लिए बोले , पता नहीं। पर आज उनका गुस्सा देखने लायक था। कई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी उन्होंने किया जिन शब्दों का इस्तेमाल वे अमूमन नहीं करते। आज हुए landmine blast को उन्होंने दो-ढाई माह पुराना बिछाया गया बारूद बताया। कई बार उन्होंने रोड ओपन का ज़िक्र भी किया। जब पत्रकार बाहर निकले तो एक पत्रकार ने दूसरे से पूछा की यार ये रोड ओपन में क्या होता है? दुसरे बताया की जब सड़क को खोलते हैं ना तभी ऐसे blast होते हैं। नक्सलियों के शहरी नेटवर्क से भी काफी खिन्न दिखे विश्वरंजन। शहरी नेटवर्क के बारे में बोलते बोलते कई बार उन्होंने दांत भींचा और कहा की सोर्स सिर्फ आप लोगों के नहीं मेरे भी हैं। इशारों इशारों में में कई बात समेटते गये। चलो गुस्सा आया तो सही , अब गुस्सा उतरे तो क्या बात है। देखते हैं उनका गुस्सा कितने दिन और किस किस पर उतरता है.

बीजापुर: ८ जवान शहीद

08 May 2010

अलाल - दलाल अब करने लगे धमाल

घर बैठे हिन्दुस्तान न्यूज़ के मालिक से हजारों रुपये ऐंठने वाले अलाल - दलाल अब धमाल करने लगे हैं। अब रोजाना उनकी बैठक कथित चैनल में होने लगी है। विद्युत् विभाग का अमला जब जांच के लिए पहुंचा , तो दस मिनट में मोहसिन अली सुहैल और अनिल पुसदकर पहुँच गये और मामला सल्टाया। अब तो नेशनल लुक के सम्पादक और पत्रकारों में चाणक्य के रूप में चर्चित प्रशांत शर्मा भी वहां जाने लगे हैं। यही तो चाहता था मैं। अरे कोई तुमको पैसा दे रहा है, तो उसका काम करो ना। अनिल पुसदकर तो हिंदुस्तान जाते ही नहीं थे बस नाम चाहते थे वो, एम् चैनल में भी उनका यही रवैय्या है, अब जब झटका लगा तब समझ में आया की मालिक अगर पैसा देता है तो वसूलना भी जानता है, फिलहाल u- tube के भरोसे चल रहा है हिन्दुस्तान न्यूज़। अब सब ठीक करने में लगे हैं अब तक अलाली में ज़िंदगी गुज़ार रहे लोग। यही तो चाहता था मैं। आयकर विभाग इस बात की जांच करेगा ही की राजेश शर्मा अचानक करोडपति कैसे बन गया और किन शर्तों पर अनिल पुसदकर और मोहसिन अली सुहैल उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। विदेशी पैसों के निवेश और उसके मध्यस्थों का खुलासा आज नहीं तो कल होगा ही। मुख्यमंत्री भी आज कल में हडताली कर्मचारियों से मिलेंगे ही। सारी पोल धीरे धीरे खुल जाएगी।
हिन्दुस्तान न्यूज़ के आंदोलित कर्मचारियों को एक झटका तब लगा जब चार लोग उन्हें छोड़कर वापस चले गये, ये वोही चार लोग थे, जिनके कारण हड़ताल की नौबत आयी। मुझे वापस लौटकर जाने वाले कर्मचारियों से कोई गिला नहीं है, दुःख इस बात का है की जिन लोगों के झांसे में आकर वे ग्रांड टी वी छोड़कर हिन्दुस्तान आये थे उन्हीं लोगों ने उन्हें धोखा दिया , और अब वे फिर उनके झांसे में आ गये। आज नहीं तो कल फिर उन्हें धोखा मिलेगा। मैं चाहता था की नए पत्रकार संगठित रहें पर डेढ़ होशियार लोग अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं । दो तीन साल में उन्हें लगने लगा है की वे मीडिया के शाहंशाह हो गये हैं । एक बार जहाँ धोखा खाए, जिसको खुले आम गन्दी गन्दी गलियां देते रहे , उन्ही के साथ फिर किस मुंह से काम कर पाएंगे। समझ से परे है। खैर । उनका जीवन है, जैसे जीना है जियें । ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दे।

04 May 2010

हिंदुस्तान में श्रम विभाग का छापा, बड़े बड़े "भाई लोग" बन गये आपा

आज का दिन रायपुर के पत्रकारों के लिए एक सुखद दिन रहा। प्रेस क्लब के नाम पर अकड़ने और मुख्यमंत्री के ख़ास बनने वालों को आज बड़ा सदमा लगा होगा। पत्रकारों को रेजा - कुली की दर पर काम कराने वालों की आज सुध ली श्रम विभाग ने । श्रम विभाग के तीन इंस्पेक्टर्स ने आज हिन्दुस्तान न्यूज़ के दफ्तर में सबका बयान दर्ज किया। कई खामियां आज खुलकर सामने आ गयी। यहाँ के किसी भी स्टाफ को नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है। तनख्वाह की कोई तय तारीख नहीं थी। ये भी जानकारी मिली कि "हिन्दुस्तान न्यूज़ "नाम का कोई पंजीयन नहीं है और तो और डॉल्फिन न्यूज़ विज़न प्राइवेट लिमिटेड का पंजीयन भी श्रम विभाग में दर्ज नहीं है। दो घंटे तक चली इस कारवाई में वहां का मैनेजमेंट ना तो लाइट का बिल ढूंढ पाया ना टेलीफोन बिल। किसी भी चीज़ का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाया मैनेजमेंट । हिन्दुस्तान न्यूज़ के मालिक को कल मुंबई भेज दिया गया, बताया गया कि अस्वस्थता के कारण उन्हें मुंबई जाना पड़ा। मोहसिन अली का भतीजा वहां administrator के पद पर कार्यरत है। वह भी कल अफ्रीका चला गया। श्रम विभाग के इंस्पेक्टर्स इस बात को लेकर परेशान रहे कि इतने बड़े चैनल ( इंस्पेक्टर्स की नज़र में ) के बारे में कोई भी बात करने को अधिकृत नहीं है। श्रम विभाग का दावा है कि आज की पूरी प्रक्रिया को नस्तीबद्ध करके वो सभी पत्रकारों को पी ऍफ़ कि राशि उपलब्ध करवाने के लिए फाइल आगे बढ़ाएंगे। ये तो हुई आज की बात , अब मैं आप लोगों के सामने एक exclusive न्यूज़ का खुलासा करने जा रहा हूँ।
"हिन्दुस्तान न्यूज़ में है विदेशी फ्यूज़ "
चौंकिए मत॥ आने वाले समय में आपको यकीन करना पड़ेगा की हिंदुस्तान में विदेशी धन का भी इस्तेमाल हो रहा हैं। आज जो बातें सामने आयीं हैं उससे तो लगता है की हिन्दुस्तान न्यूज़ के मालिक राजेश शर्मा को इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रेस क्लब के कथित अध्यक्ष अनिल पुसदकर और मुख्यमंत्री के ख़ास रहने वाले हाजी मोहसीन अली के रहते हुए नवेद को administrator कैसे बना दिया गया। कितना अनुभव है उसको। जुमा जुमा चार दिन तो हुए हैं उसको। वो भी फोड़ा है वॉच न्यूज़ का। कोई लम्बी चौड़ी साज़िश की बू आ रही है मुझे। अनिल पुसदकर और हाजी मोहसीन अली सुहैल का रजिस्टर में नाम भी नहीं है, फिर किस बात का उन्हें भुगतान मिल रहा है। सब काम दो नंबर में चल रहा था वहां। अब धीरे धीरे परतें खुलेंगी। मुझे लगने लगा है की कोई बड़ा भंडाफोड़ होगा और सब जायेंगे तेल लेने।
हिन्दुस्तान न्यूज़ के पत्रकारों ने जो पत्र मंत्रियों और अधिकारीयों को सौंपा है उसे मैं जस का तस आपके सामने रख रहा हूँ ।
महोदय,
हम अधोहस्ताक्षारित लोग डोल्फिन न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड रायपुर हिन्दुस्तान टी वी न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं। पिछले दो तीन दिन से इस चैनल के स्वामी राजेश शर्मा और उनके सलाहकार मोहसिन अली सुहैल हम लोगों को रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने व् परिसर में प्रवेश से रोक रहे हैं। यह न्यूज़ चैनल एच टी वी के नाम से पंजीकृत बताया जाता है क्योंकि हिन्दुस्तान नाम से पंजीयन पत्र वापस हो गया है। यह उल्लेखनीय है की उस न्यूज़ चैनल के मालिक राजेश शर्मा ही नेशनल लुक अखबार व् डोल्फिन international स्कूल के स्वामी हैं। डोल्फिन स्कूल की वर्तमान में कुल ३२ शाखाएं हैं। रायपुर में ८, भाटापारा, राजिम तिल्दा नेवरा और दुर्ग जिले में बेमेतरा , बालोद, देवकर पंडरिया, कवर्धा, चारामा, कांकेर सरिया, सरायपाली, पिथौरा मुंगेली, रायगढ़ , महासमुंद, नगरी में भी इसकी शाखा है। पाटन कोंडागांव और बागबहरा में भी स्कूल खुलने वाली है।
पहली से बारहवीं तक की पढाई के लिए छात्र छात्रों के पालकों से एक मुश्त ८० हज़ार रुपये यह कह कर लिया जाता है की बीच में पैसे नहीं लगेंगे। सी बी एस ई की मान्यता एक वर्ष के लिए नाम मात्र की शालाओं को है, साथ ही राज्य शाशन की मान्यत भी किसी स्कूल को नहीं है। और राजेश शर्मा इसकी आड़ में ५३ करोड़ की फीस एकत्र कर लिए हैं। किसी भी स्कूल को एक साल की मान्यता है, फिर राजेश शर्मा किस तरह पालकों से १२ साल की फीस जमा करा रहे हैं। ५३ करोड़ में से आज राजेश शर्मा के पास ५३ लाख भी किसी बैंक में जमा नहीं करा पाए हैं। तो फिर छात्रों को बारहवीं तक उत्तीर्ण कराने का ज़िम्मा किसके पास होगा, उमा शर्मा डोल्फिन स्कूल की एम् डी हैं। उनके जारी बमक चेक प्रखर टी वी और कई मामले में बाउंस हुए हैं। आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग और आयकर विभाग को डोल्फिन स्कूल में जमा फीस का निरीक्षण कर सत्यता का पता लगाना चाहिए।
यह उल्लेखनीय है की स्कूल फीस से जमा राशि को राजेश शर्मा ने टी वी न्यूज़ चैनल खरीदने के अलावा नॅशनल लुक के लिए मशीन खरीदने में लगा दिया है। इनकी दो सौ से ज्यादा बसें चलती हैं। दो सौ से ज्यादा सुरक्षा गार्ड भी हैं। जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। राजेश शर्मा ने पहले न्यूज़ टाइम ,टी वी २४ खरीदा फिर आज़ाद न्यूज़ खरीदा फिर चर्दिकला में टाइम टी वी खरीदा फिर हिन्दुस्तान टी वी के लिए आवेदन लगाया जो निरस्त हो गया। अब स्थिति यह है की एच टी वी का सिर्फ लोगो ही पंजीकृत है , ऐसा बताया जाता है।
नेशनल लुक के लिए १८ लाख रुपये इंटीरियर पर ही खर्च हुए फिर ७० हज़ार रुपये प्रति पत्रकार देकर १४ लोगों को एक एक वर्ष के लिए ६ से ७ लाख रुपये अग्रिम में दिए गये हैं। राजेश शर्मा के सलाहकार मोहसिन अली सुहैल का दावा है की उन्होंने बाज़ार से ६० लाख रुपये राजेश शर्मा को दिलाये हैं। नेशनल लुक की मशीन ही तीन करोड़ की है, अखबार का दफ्तर और एच टी वी न्यूज़ चैनल का किराया ही लाखों में है। सभी स्कूल किराए के मकानों में चल रहे हैं.छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूली शिक्षा विभाग की मान्यत भी राजेश शर्मा के डोल्फिन स्कूल को नहीं है, तब किस तरह से वे धड़ल्ले से ८०-८० हज़ार रुपये एकत्र कर रहे हैं? आखिर स्कूल के पैसे कहाँ निवेश हुए या कहाँ जमा है, यह राजेश शर्मा को सरकार और आम लोगों के बीच स्पष्ट करना होगा, प्रशाशन को खुश करने के लिए प्रेस की मशीन का उदघाटन मुख्यमंत्री से कराया और कवर्धा की स्कूल में उनकी माता जी की मूर्ति लगाकर उन्हें खुश करने की कोशिश की गयी। एच टी वी पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग में रंग है। पाकिस्तान के ज़रिये दाऊद का पैसा डोल्फिन, नॅशनल लुक और एच टी वी में लगा है। छत्तीसगढ़ अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष , उनके बेटे और भाई की भूमिका संदिग्ध है। मोहसिन अली हर साल दुबई जाते हैं। उनकी पत्नी पाकिस्तान की हैं। मुसल्म देशों से मोहसीन अली के ज़रिये राजेश शर्मा को पैसे मिलने की भी खबर है। ये तो हुआ उनका ज्ञापन । श्रम विभाग के इन्स्पेक्टार्स के जाने के बाद वहां प्रबंधन की एक बैठक भी हुई। सब बड़े बड़े भाई लोग इसमें शामिल हुए, नॅशनल लुक के सम्पादक प्रशांत शर्मा, प्रेस क्लब के कथित अध्यक्ष अनिल पुसदकर, सलाहकार मोहसिन अली सुहैल , कुछ स्कूल और अखबार प्रबंधन के लोग भी आये। बताते हैं की बैठक में कहा गया है की छापे से कुछ नहीं होता, सब ठीक हो जायेगा। उनको नहीं पता की कल वहां की बिजली कटने वाली है। घरेलु बिजली से पूरा व्यावसायिक काम हो रहा है।अच्छा है। फ़ोकट का पैसा लेने वालों को अब जाकर काम मिला है। स्वामिभक्ति के लिए दौडभाग तो करनी ही पड़ेगी। अभी तो मुख्यमंत्री और बाकी मंत्रियों से यहाँ के कर्मचारी मिले ही नहीं हैं।

01 May 2010

ब्लॉग का दिखा असर , हिन्दुस्तान में ढाया कहर

जब से ब्लॉग लिख रहा हूँ मुझे विश्वास था की अख़बार से ज्यादा लोग अब ब्लॉग की दुनिया से सरोकार रखते हैं । कुछ दिन पहले मैंने हिन्दुस्तान न्यूज़ के बारे में लिखा था कि यहाँ पत्रकारों से रेजा कुली की तरह काम लिया जा रहा है। आज मजदूर दिवस पर पत्रकारों का ज़मीर जाग गया और चार लोगों ने हिन्दुस्तान से इस्तीफे की पेशकश कर दी। बाकी पत्रकार भी इन चारों के समर्थन में आ गये और वहां पेन डाउन स्ट्राइक हो गयी। इस बात की पुष्टि करनी हो , और दुर्भाग्य से आप देख पायें तो कल दिन भर देखिये रायपुर के जनसंपर्क की सरकारी ख़बरें और, कुछ ख़बरें रायगढ़ की। अब चंगु - मंगू को पालने वाले मालिक को समझ में आया की पत्रकार आखिर होते क्या हैं। चंगु- मंगू को क्या है, उनके पास पैसे कमाने के कई रास्ते हैं। एक मंगू तो आजकल मंत्रियों और विधायकों के पास स्वेच्छानुदान का आवेदन लेकर घूमते देखा जा रहा है। चंगु को पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े मामलों से ज्यादा पुलिस के अफसरों के साथ शाम रंगीन करने में ज्यादा मज़ा आने लगा है। खैर ... ऊपर वाला सब देख रहा है,
अब मैं स्वयं इस मामले में गंभीर हूँ। एक सप्ताह का समय मुझे चाहिए। मैं ठीक कर दूंगा ऐसे शोषकों का खेल। शर्म सिर्फ इस बात को लेकर आएगी की कथित अध्यक्ष के खिलाफ भी लामबंद होंगे पत्रकार। पत्रकार बिरादरी को अब तो जागना ही होगा, या फिर सबको यही सोचना होगा की भाड़ में जाएँ सब , अपने को बता के थोड़े ज्वाइन किया था, जाओ भुगतो। चोर चमार और धोखा धडी करने वालों के कौन मुंह लगेगा। सब को सिर्फ ज़मीन चाहिए, कहीं अखबार के नाम से तो कहीं स्कूल या चैनल के नाम से और मोहरे बन रहे हैं पत्रकार। अब इन मोहरों को कौन समझाए की ज़मीन छोड़कर ज़मीन की आशा रखने वालों कितनी ज़मीन कहाँ मिलनी है ये ऊपर वाले ने पहले ही तय कर रखा है। श्रमजीवी पत्रकार संघ का एक धड़ मेरे साथ है। मैं भी ये लड़ाई अकेले नहीं लड़ना चाहता। सबसे लड़ लड़ कर क्या मिला मुझे ? पर अब ये सोचने का समय नहीं है, जंग छिड़ी है तो भागेंगे नहीं। अगर पत्रकारों से अब रेजा कुली की दर पर काम लिया गया तो मजदूर संगठनों को भी जोडूंगा। हिन्दुस्तान के पत्रकारों ने आज जो एकजुटता दिखाई है, उसके लिए सभी पत्रकारों को साधुवाद। एक बात उन साथियों को और कहना चाहूँगा की रोज़ी रोटी की चिंता ना करें, ऊपर वाला भूखा उठाता ज़रूर है, पर भूखा सुलाता नहीं है, ईश्वर के न्याय के प्रति आशान्वित रहिये। सब ठीक हो जायेगा। अगर नहीं हुआ तो अपन सब मिलकर इसे ठीक करेंगे। लड़ाई शुरू की है तो आगे बढ़ो। चींटियों की एक जुटता से हाथी को भी पछाड़ा जा सकता है, और ये सब तो सफ़ेद हाथी हैं। दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर, हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेकरार.

24 April 2010

नाम है हिन्दुस्तान न्यूज, पत्रकारों का रेजा कुली जैसा यूज़ ?

anchor byte का ७५ रूपया, sound byte with ambience का १०० रूपया। complete story का १२५ रूपया और exclusive story का 1५० रूपया, इस दर पर काम कर रहे हैं पत्रकार। रेजा -कुली का रेट भी इससे कहीं ज्यादा है, पर कौन पहल करे। हिंदुस्तान न्यूज़ के मालिक ने प्रेस क्लब के कथित अध्यक्ष अनिल पुसदकर को यहाँ हेड बनाकर जो रखा है, मजे की बात ये है कि ये वही पत्रकार हैं जो अनिल पुसदकर के कहने पर ग्रांड न्यूज़ छोड़कर हिन्दुस्तान आये। उन्ही से इस दर पर काम लिया जा रहा है। अब अपनी खुन्नस में वहां से तोड़ दिया तो यहाँ ध्यान रखना चाहिए था। या सबके लिए यही नियम लागू करवा देते। मानसिक रूप से नक्सलवाद से प्रभावित पत्रकार अब सोच रहे हैं बदला लेने की। जिस पत्रकार ने एक पत्रकार से एक चैनल का ब्यूरो दिलाने का झांसा देकर लाखों वसूले थे, वही पत्रकार यहाँ कॉपी चेक कर रहा है। चंगु -मंगू भी बढ़िया पालकर रखे हैं हिन्दुस्तान न्यूज़ के मालिक ने । एक हैं हाजी मोहसिन अली सुहैल। दंड कारन्य से संवाददाता बन कर पत्रकारिता की शुरुआत की और आज मुख्यमंत्री के ख़ास हैं। सरकारी खर्चे पर कई बार विदेश में शेरो शायरी का जलवा बिखेर कर आ चुके हैं। बेहद संजीदा लिखते हैं। कसीदाकारी तो कोई उनसे सीखे। पर आग नहीं है, बहुत अच्छे इंसान हैं। अब उन्हें इंसानियत की कसम है कि अगर वो हिन्दुस्तान में व्यवस्था सुधार नहीं पाए तो क्या मतलब मालिक के कान तक जाने का। अपनी रोजी -रोटी की व्यवस्था तो कुत्ता भी कर लेता है, ऊंची नस्ल का हो तो उसके मालिक भी उसे और भी ज्यादा सुविधाएं देते हैं। मगर मैं बात कर रहा हूँ इंसानों की , उन इंसानों की जिनके साथ आप काम कर रहे हैं, आगे वो लोग आपके साथ काम करें या ना करें , लेकिन आपकी उनसे मुलाकात तो रोज़ होगी, क्यों शोषण हो रहा है पत्रकारों का ? कौन उठाएगा आवाज़ ? हिन्दुस्तान न्यूज़ की कहानी भी अजीब है, जब शुरू हुआ तो विज्ञापन दिए गये की छत्तीसगढ़ की ख़बरें अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ७४ देशों में देखी जा सकेंगी। चरदी कला में १५ - १५ मिनट का स्लोट लिया गया था, अब हालत ये है कि ४७ मोहल्ले के लोग भी इसका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। इसके बावजूद स्लोगन रखा है -अपना देश अपनी बात। अब लगता है कि कलेक्टर से पूछना ही पड़ेगा कि १९८६ के आबकारी नियम का पालन कौन कौन कर रहा है। केबल पर तो न्यूज़ के दसियों नियम हैं । व्यक्यिगत रूप से मुझे लगता है की हिंदुस्तान न्यूज़ के मालिक राजेश शर्मा को कुछ लोग गोला बनाकर निपटा रहे हैं। ऐसा नहीं होता तो विज्ञापन से पट गया होता चैनल। नॅशनल लुक के एक विज्ञापन से काम नहीं चलने वाला। अनिल पुसदकर का समझ में आता है, उनके पास दो -दो चैनल का ज़िम्मा है। एम् चैनल में भी उन्हें समय देना पड़ता है। बाकी काम अलग। न्यूज़ बुलेटिन में गलतियाँ तो होती ही नहीं, पर अपने अपनों को आगे बढाने के लिए चंगु -मंगू अपने मालिक के आसपास किसी भी ऐसे टेक्नीकल बन्दे को फटकने नहीं देते जो मालिक को इन लोगों की हैसियत और औकात बता दे। जब मैंने प्रखर टी वी ज्वाइन किया तो एक शर्त रखी थी, इतनी टी आर पी और इतना विज्ञापन आने के बाद मैं अपनी तनख्वाह तय करूँगा। ऐसा हुआ भी लेकिन कुत्तों को घी पचता कहाँ है, मेरे छोड़ने के बाद चैनल बैठता गया और दो दिन पहले अंततः प्रखर टी वी बंद हो गया। मैं अपनी बड़ाई नहीं कर रहा पर पत्रकारिता की आड़ में ज़मीन का धधा करने वालों को थोड़ा तो सोचना चाहिए कि दूसरों की तनख्वाह कम करने की बजाय खुद कम पैसा लेते, पत्रकारिता के भरोसे नई नई शादी करने वालों पर क्या गुजरेगी, उनकी पत्नियों के सपनों के बारे में तो सोचते..... जिनकी सोच रहे हैं वो तो अभी शादी के लायक भी नहीं है। खैर हम दुआ कर सकते हैं और करते हैं की अल्लाह हिंदुस्तान के बन्दों की सुने और उन्हें नेक राह दिखाए। आमीन .....

11 April 2010

कौन है नक्सलियों का "सहारा"...

शहीद जवानों के शव और बचे जवानों का खून से लथपथ शरीर देखकर न कुछ लिखने का मन् कर रहा था न कुछ सोचने का, अब थोड़ा शांत हुआ है दिमाग। अब सवाल ये उठता है कि पुलिस नक्सलियों के शहरी नेटवर्क पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है। सारा गणित तो शहर से होकर नक्सालियों तक जाता है। देश की सबसे बड़ी नक्सली वारदात ने हिलाकर रख दिया सबको। चैनलों में होड़ मची रही, लेकिन सहारा समय ने तो हद्द कर दी। बची खुची कसर साधना न्यूज़ ने निकाल दी। सहारा समय के संवाददाता उस दिन रायपुर में थे और फ़ोनों में पट्टी चल रही थी कि वो दंतेवाडा से बात कर रहे हैं। अगर संवाददाता यहाँ थे तो किस मजबूरी से चैनल ने ऐसा किया। अगर संवाददाता दंतेवाडा में थे तो फ़ोनों के तत्काल बाद वो अचानक रायपुर में कैसे दिखने लगे? कोई हेलीकाप्टर रेंट में लिया था क्या सहारा ने उस दिन के लिए ? , सबसे पहले ओबी वैन भी सहारा के पहुँचने की खबर थी, थोड़ा जांच पड़ताल किया तो पता चला कि आज तक इनकी ओबी वैन वहां नहीं पहुंची है। राष्ट्रीय - अन्तराष्ट्रीय चैनल के लोग दनादन रायपुर आकर जगदलपुर और दंतेवाडा रवाना होने लगे और सहारा की ओबी वैन गायब? ऐसा कैसे हो गया? अगर टिकर गलती से चल रहा था तो संशोधन भी तो किया जा सकता था।
सब बदला निकाल रहे हैं क्या? नक्सलियों ने जवानों से बदला निकाला, विपक्ष ने सरकार से और पत्रकारों ने पत्रकारों से। गुरुकुल आश्रम का विवाद अभी सुलझा ही नहीं था और सहारा के पत्रकार एक नए विवाद में घिर गये। कितना टी आर पी बढाओगे? विवाद भी तो बढ़ रहा है? कौन समेटेगा इसे? ऊपर से कोई नहीं आएगा। स्पर्धा की दौड़ में साधना के संवाददाता ने एक नक्सली नेता का फ़ोनों करवा डाला। वेरी गुड। नक्सलियों की स्वीकारोक्ति वाली विज्ञप्ति भी सिर्फ सहारा के पास ही पहुंची। बाकी अखबार और चैनल विज्ञप्ति का रास्ता ही देखते रह गये। क्या चल रहा है पत्रकारिता की आड़ में। अब तो पुलिस की ज़िम्मेदारी और बढ़ी है, किसका डर है पुलिस को? क्यों पूछताछ नहीं करती पुलिस? नक्सलियों का कोरिअर पहुँचाने वाले पियूष गुहा को किसने रुकवाया था रायपुर में , ऐसे कई सवाल हैं जो अब शहीद जवानों के रक्त रंजित शव पूछ रहे हैं। कौन देगा जवाब?
केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने आखिर इस्तीफे की पेशकश तो की। लेकिन छत्तीसगढ़ के मंत्रियों के कान में जूँ तक नहीं रेंगी। भारतीय जानता पार्टी की स्थापना बैठक में आतंरिक रूप से ही इस्तीफ़ा मांग लेते, फिर स्वीकार नहीं करते। एक सन्देश तो जाता। अपने घर में कोई मरता है तो सालों साल उनकी कसक साथ रहती है, देश के जवान शहीद हुए तो कोई ग़म नहीं ..... मर गयी है आत्मा सबकी। विपक्ष भी कम नहीं है। बंद करा देने से सुलझ जायेगा मामला? मुझे तो व्यक्तिगत रूप से लगता है की छत्तीसगढ़ में मिली जुली सरकार चल रही है? जिसके मन् में जो आ रहा है कर रहा है, राम राज्य देखना है तो आ जाओ छत्तीसगढ़। ऐसी सिधाई किस काम की जो सरकार को नपुंसक बना दे।
अब पूरे मामले की जांच हो रही है, दोनों सरकारें पहले दिन से कह रही हैं की गलती सी आर पी ऍफ़ के जवानों की है, बिलकुल ठीक कहा दोनों ने। वाकई में अपना घर बार छोड़कर जंगल में नौकरी करना गलती है जवानों की। क्यों करते हो सर्चिंग करने की गलती? जब पता है सरकार ढुलमुल है, तो क्यों गये होशियारी दिखाने? सब ख़त्म हो गया ना? एक दिन पहले तक तो तो रायपुर से दिल्ली तक यही गूँज थी की नक्सलियों का सफाया कर देंगे २ साल में, ऐसे उटपटांग बयान देने की ज़रुरत क्या है। मेरी तो पैदाइश यहीं की है, जब से पत्रकारिता से जुड़ा हूँ रोज़ सुन रहा हूँ हेलीकाप्टर आएगा तो सर्चिंग तेज़ होगी। हज़ारों लोग तो शहीद हो गये, कब आएगा हेलीकाप्टर, नक्सली भी भटके से लगते हैं। उनका टार्गेट कौन है, क्या है । वो जवान जो अपने घर से हजारों किलोमीटर अपनी बीवी बच्चों को छोड़कर देश सेवा कर रहे हैं। वातानुकूलित चम्बर में बैठकर रणनीति बनाने वालों को अब पता चल गया होगा की जंगल में किसी की नहीं चलती, अपनी सुझबुझ ही काम आती है। आख़िरकार छत्तीसगढ़ के डी जी पी को कैंप करना पड़ा जंगले में। घूमे मोटर साइकल में । पता चल गया होगा जंगल में कितनी गर्मी होती है, ऐसे में जब दिल सुलग रहे हों तो गर्मी और भी तंग करती है , कान के पीछे से पसीना जब शुरू होता है तो रुकने का नाम नहीं लेता. बातें बहुत हुई अब काम की बात पर सबको ध्यान देना होगा, नक्सलियों के शहरी नेटवर्क पर पुलिस को ध्यान केन्द्रित करना ही होगा, तभी बड़ी सफलता संभव है। अब शहीदों के शव ढोते कंधे दुखने लगे हैं. सबको मिलजुलकर पहल करनी होगी. बयान बाजी बंद करनी होगी. कुछ सवाल मैंने ओन वीडिओ पूछा है, अपने मुख्यमंत्री से। utube में जाकर ahfazrashid टाइप करके या मेरे पोर्टल media-house.org पर भी आप ये संक्षिप्त बातचीत देख सकते हैं। जय हिंद , जय भारत , जय छत्तीसगढ़..

12 March 2010

पहले अनाथ पत्रकारों को तो सम्हाल लो...

प्रेस क्लब का अध्यक्ष क्या राष्ट्रपति होता है ? वो भी अवैध ....चार साल तक बेशर्मी से... क्या हो गया है रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर को? आज कुछ अख़बारों में उनका बयान पढ़ा । अपने बयान में उन्होंने कहा है की प्रेस क्लब गुरुकुल आश्रम के बच्चों के साथ है। मैं तो पहले दिन से कह रहा था कि उन बच्चों को इस पचड़े से दूर रखो। प्रेस क्लब की अनाथाचारी तो ख़त्म कर नहीं पा रहे हैं , अब अनाथ बच्चों पर ध्यान देंगे। स्वर्गीय पत्रकार कुलदीप निगम आज जिंदा होते तो ये नौबत ही नहीं आती। तकनीकी कारणों का हवाला देकर पत्रकारों को कब तक दिलासा देते रहेंगे अनिल जी। अब वक्त आ गया है। बुरे वक्त काटकर मैं और भी ज्यादा उर्जावान हुआ हूँ।
बहुत दिन से सोच रहा था कि अनिल पुसदकर के बारे में भी लिखूं। फिर सोचा और भी तो ग़म हैं ज़माने में। राजधानी का प्रेस क्लब है। कौन गरिमा का ध्यान रखेगा। जब मैंने नक्सली - पत्रकार पुलिस भाई भाई लिखा तो अनिल भैय्या का कॉल आया था, बोल रहे थे कि राव तो चोर है। मैंने कहा - होगा, मेरा टार्गेट तो सहारा , रुचिर और राजीव ब्रिगेड हैं। मैं ज्यादा चोर उचक्कों के बीच रहा नहीं हूँ इसीलिये इस फील्ड के बारे में ज्यादा नॉलेज नहीं है। अनिल भैय्या को कोई स्टेप उठाना था तो वो ये कि सहारा के जिन पत्रकारों के कारण मासूमों को रोना बिलखना पड़ रहा है, उन्हें प्रेस क्लब से निष्कासित कर देते, पर वो नहीं करेंगे। कारण - गद्दी हिल जाएगी। मुझे तो लग रहा है कि राजधानी के पत्रकार अपना ध्यान राजनीति में ज्यादा और पत्रकारिता में कम लगा रहे हैं। हरिभूमि के पत्रकार राजकुमार सोनी को इस मामले में क्या रूचि थी? खैर उसने मानवीय धर्म निभाया है और अपने प्रतिस्पर्धियों को टक्कर भी दी है। भले ही उसके कारण रुचिर का ख़ास ब्रम्हवीर खून के घूँट पीकर हरिभूमि में समय काट रहा हो। सहारा के विवादास्पद पत्रकारों को निलंबित करने की बजाय प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने निशाना बनाया पी सेवन के पत्रकार गिरीश केशरवानी को। वो गरीब हाथ में कुछ फार्म लेकर आया था, बस भड़क गये , भगा दिया उसे प्रेस क्लब से । बाद में पता चला कि पी सेवन के हेड अजय शर्मा फिर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकारों का कोई संगठन खड़ा कर रहे हैं। बस ये बात उन्हें नागवार गुजरी। अजय भैय्या की तो आदत है, ऐसे तमाशा करके गाली खाने की। अब उनका नया शगल है- इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोशियेशन ऑफ़ छत्तीसगढ़। सब जगह फार्म भेज रहे हैं वो। मेरे पास नहीं भेजे हैं अभी तक। जानते हैं मेरी आदत। काम क्यों नहीं करते ये लोग। संगठन बना लोगे तो क्या हो जायेगा। पी सेवन या १८ के नाम से वसूली अब नहीं हो पा रही है क्या? अपनी हैसियत तो बना लो कि मंत्री लोग आप लोगों को देखकर भागें मत।
मैं अनिल भैय्या को दो साल से बोल रहा हूँ कि प्रेस क्लब का चुनाव अगर किसी तकनीकी कारण से नहीं हो पा रहा है तो एक इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सेल बना लो। पर वो ऐसा भी नहीं करेंगे। दो श्रमजीवी पत्रकार संघ एक दुसरे का कपडा फाड़ ही रहे हैं। ऐसे में महासंघ कि क्या ज़रुरत आन पड़ी? चलो संगठन बन भी गया तो उसे ढंग से चलाते ना? शशि कोन हेर ने इस संगठन को बिलासपुर में सीमित कर दिया ना?
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार तो अब किसी को श्रद्धान्जलि देने भी प्रेस क्लब आना पसंद नहीं करते। क्या से क्या हो गया है प्रेस क्लब। हम सब ज़िम्मेदार हैं इसके लिए। अख़बार बांटने वाले हाकर पदाधिकारी बने बैठे हैं । बेशर्मी से दांत निपोरते हुए। हम लोगों को क्या है, हम तो रात को जाते हैं । हम तो नाईट के मेम्बर हैं। अनिल पुसदकर के प्रोफाइल में पढ़ा की वो चार साल से लगातार प्रेस क्लब के अध्यक्ष निर्वाचित होते रहे हैं। कब और कहाँ हुआ ये निर्वाचन? चौबे कालोनी में? कोई डेट वेट याद है। कोई रजिस्टर है? कुछ भी चल रहा है। प्रेस क्लब तो चारागाह हो गया है। आधे से ज्यादा पत्रकार तो वहां बैठकर ज़मीन की दलाली से जुड़ गये हैं। दो महीने से मैंने भी वहां दिन में जाना बंद कर दिया है। मुझे कैसे भगाओगे ? हाँ इस ब्लॉग को पढने के बाद बैठक ज़रूर बुला सकते हो। कौन आएगा बैठक में? वही ब्राम्हण पारा के चुनिंदे नुमाइंदे? बंद कमरे में कर लोगे फैसला? चलो कर के दिखाओ। मैं तो खुद कोर्ट जाना चाह रहा हूँ। पर कुछ कागज़ हाथ में होना चाहिए ना? बहुत दिन बाद कल कुछ अखबार और चैनल के दफ्तर का मौका मिला। वहां पता चला कि हम लोगों का जनसंपर्क क्या टूटा अपने ही लोग पीठ पीछे बुराई करने में लगे हैं। आज से हम सारे प्रेस जायेंगे, अब अलख जागेगी चुनाव की। अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने वालों की हम लेंगे खबर। इलेक्ट्रोनिक मीडिया का कीड़ा होने के बावजूद हम घर बैठे हैं और लोग ऐश कर रहें हैं। ये मेरी कुंठा नहीं, व्यथा है। कुंठित वो होते हैं जिन्हें कुछ आता जाता नहीं , जिन्हें हमेशा नौकरी जाने का खतरा बना रहता है। हम तो नवरात्री के एकम से मीडिया हाउस जोर शोर से शुरू करने कि तैय्यारी कर रहे हैं। न्यूज़ पोर्टल फाइनल हो चुका है। हम स्टोरी कि बैंकिंग भी कर चुके। अब हम बताएँगे खबर और खबर के पीछे की खबर। बस थोड़ा सा इंतज़ार ..........

09 March 2010

क्यों लौट आयी मेरी लव बर्ड...?




कल सुबह से मन् हलाकान था। दिनचर्या गड़बड़ा गयी थी। सुबह उठकर चारों लव बर्ड को पिंजरे सहित बालकनी में ले गया। उनका कुण्डी थोड़ा सा खोला और उनके लिए दाना लेने अन्दर आ गया। अन्दर आकर कंप्यूटर से चिपक गया, अक्सर ऐसा होता था। दो घंटे बाद अचानक याद आया कि लव बर्ड्स के दाने का बर्तन साफ़ कर दाना देना है उन्हें। पिंजरे के पास गया तो मेरी हालत ख़राब हो गयी। बुरे समय में मेरा साथ देने वाली तीन लव बर्ड उड़ चुकी थीं । एक बची थी और पिंजरे का दरवाज़ा तेज़ हवा के कारण बार बार खुल रहा था, मैंने पूरा खोल दिया। मुझे पता है कि लव बर्ड अकेले नहीं रहते। मैंने उससे भी कहा कि जाओ तुम भी उड़ जाओ। मन् भारी था फिर भी मीडिया हाउस कि स्टोरी एडिट करने बैठ गया। सोचा, मन् को बहलाने का इससे अच्छा उपाय कोई नहीं है। शाम होने को आयी। अपनी दिनचर्या के अनुसार पिंजरा अन्दर करने बालकनी में गया तो लव बर्ड पिंजरे के अन्दर ही थी। मैंने उसे भी उड़ा देने की ठान ली। अन्दर हाथ डालकर उसे पकड़ना चाहा तो उसने मेरे हाथ पर अपनी चोंच गड़ानी शुरू कर दी। मैंने तौलिये की मदद से उसे पकड़ा और पिंजरे से निकाल कर आज़ाद कर दिया उसे.......
आज सुबह बिट्टू का कॉल आया कि जल्दी से नीचे आओ। अपनी एक लव बर्ड नीचे घूम रही है, वो उड़ नहीं पा रही है। मैं फिर छोटा तौलिया लेकर दौड़ा। उसे पकड़ने लगा तो उड़ने लग गयी। फिर एक जगह पर चुपचाप बैठ गयी। मैं उसे डांटने लगा कि तुम तीन तो एक साथ भागे थे ना, बाकी कहाँ हैं। मैंने हाथ दिया तो हथेलियों में आकर बैठ गयी। घर लाकर उसे अपने बेडरूम में खुला छोड़ दिया। मेरे पिंजरे में अब उसका कब्ज़ा हो गया। मैंने दाने की कटोरी में दाना डाला और पानी की कटोरी भी भर दी। उसके पास जैसे ही दोनों कटोरियाँ रखीं वो टूट पड़ी खाने पर..... गटागट पानी भी पीने लगी। मेरा मन् पसीज गया। मैं समझ गया की बाहर क्या हालत है पक्षियों की। गर्मी बढ़ रही है, हम एयर कंडीशन या कूलर में खुद तो महफूज़ हो जाते हैं लेकिन पशु पक्षी बेचारे भटकते रहते हैं। इनके संरक्षण के नाम पर सरकारी सांड अपना पेट भर रहे हैं। कई बार कुछ पशु पक्षी प्रेमियों ने एस एम् एस भी किया कि अपने घर के बाहर पशु - पक्षियों के लिए दाना पानी रखो, कुछ ने पहल की तो कुछ ने इसे इग्नोर कर दिया। खैर ....मैं आज बहुत खुश हूँ कि मेरा प्यारा एक लव बर्ड तो मेरे पास वापस आ गया। हो सकता है, बाकी लोग भी भूख प्यास से तंग आकर वापस घर आ जाएँ। मैं चाउंर वाला बाबा तो नहीं हूँ लेकिन बुरे वक्त में जब इन लोगों का दाना ख़त्म हो जाता था तो बहुत रोता था। ऊपर वाले से कहता था कि मैं तो भूखे प्यासे रह लूँगा तू इनकी परीक्षा क्यों ले रहा है। और दो - तीन घंटों में कहीं ना कहीं से दाना आ ही जाता था। अब जब दिन ठीक हो रहे हैं तो क्यों भागे होंगे पक्षी? अब चले गये थे तो वापस क्यों आ रहे हैं। ऊपर वाले की महिमा मैं अच्छे से समझ गया हूँ । वो जो ना करे कम है। परीक्षा ली मेरी और मैं भी सप्लीमेंट्री भर भर कर लौटता रहा। मैंने तय भी कर लिया है जिसे मेरे साथ ठीक से रहना है रहे, नहीं तो जहाँ जाना हो जाए। मुझे समय ने साफ़- साफ़ कह दिया है, बेटा अकेले आया है , अकेले जी और अकेले चले आना।

06 March 2010

नक्सली- पुलिस-पत्रकार भाई भाई?....

आखिरकार वो आदमी जेल चला गया, जो नक्सली हमलों में मारे गये बच्चों का सहारा था , मददगार था उनका। ५९ बच्चों का गुरु पापा था , लेकिन सहारा ने ही उसे बेसहारा कर दिया। बहुत अच्छा काम किया सहारा समय ने, ऐसे लोगों को निपटाना ही चाहिए जो नक्सलवाद के आड़े आयें। समाजसेवी बनता था साला। बच्चे बेचेगा। मज़ा आ गया, पुलिस ने भी क्या तत्परता दिखाई। इस घटना से ऐसा भी लगने लगा है कि नक्सली- पुलिस - और पत्रकार भाई भाई तो नहीं होते जा रहे।
राजीव ब्रिगेड के लोग भी बधाई के पात्र हैं। नाम राजीव ब्रिगेड और काम ? सूचना जानने का अधिकार? क्या करते हैं रोज़ ये लोग? सहारा के दफ्तर में रोज़ की उठक बैठक क्या साबित करती है? पत्रकारिता की आड़ में क्या हो रहा है ये सब? छोटे छोटे मामलों में वरिष्ठ पत्रकारों की दखल , क्या चल रहा है। अगर बड़ा मामला था तो लोकल चैनल और अखबार वाले क्यों बंटने लग गये। मुझे याद नहीं कि कभी सहारा ने वहां की ये खबर दिखाई हो की एक ऐसा इंसान भी शहर में है जो नक्सलियों से नहीं डरता और उनकी करतूतों से अनाथ हुए बच्चों को पालने का दंभ रखता है। हाँ ई टीवी ने कई बार फोकस किया है। times now की टीम तो दंतेवाडा तक जाकर ऐसे बच्चों का साक्षात्कार कर आयी है । खबर तो खबर होती है, बस नजरिया चाहिए। पर जब नज़रों में अर्थ का चश्मा चढ़ जाये तो कुछ नहीं दिखता।
टी आर पी भी बढ़ गयी होगी सहारा समय की। अच्छा मसाला था। खबर होती तो खबर लिखता पर वो तो मसाला था, sponserd मसाला। अब पुलिस करे तो क्या करे, बड़े बड़े मामले सुलझा नहीं पा रही है, इस मामले में सी डी तैयार मिल गयी। अनियमितताएं भी रेडीमेड मिल गयीं। बस हो गया काम , जय श्री राम। खबर बनाने के लिए ड्रामेबाजी की ज़रुरत नहीं होती, जज्बा चाहिए होता है, पर जब सब बिकाऊ हो तो उस पर कमेन्ट करना भी शायद मूर्खता होती है, पर सच कहूँ , मुझसे रहा नहीं गया। ख़बरों से दूर ज़रूर हूँ, पर खबरदार हूँ मैं। मेरी थोड़ी सी तैयारियां बच गयी हैं पर बहुत जल्द मैं इन्कलाब लाने की कोशिश फिर करूँगा। ज़िन्दगी और मौत का वो सोचें जिन्होंने अंड बंड कमाई की है और उसे खर्चा करने या बचा कर रखने, या और कमाने की जुगत में जी रहे हैं। नक्सलवाद से बड़ा मिशन है पत्रकारिता। पर जूनून नहीं है, सब दलाल होते जा रहे हैं, हे भगवान् , या मेरे परवर दिगार आप लोग कुछ करोगे या नहीं? चलो मेरे अन्दर ही एक अलख जगाकर उसकी रक्षा करो। जब बुलाना हो बुला लो, पर जीते जी ऐसी दुर्दशा मत करो। आज़ादी अब ज़रूरी हो गयी है।

03 March 2010

नॉन-सेन्स टाइम्स अब नेट पर भी....

अगर इस होली में आप नॉन सेन्स टाइम्स ना पढ़ पाए या देख पायें हो तो आपकी सुविधा के लिए इसे नेट पर भी प्रकाशित कर दिया है। आप अपनी सुविधा के अनुसार लिंक करें।
://www.nonsensetimescg.blogspot.com

24 February 2010

मज़ाक न बन जाएँ छत्तीसगढ़ी फ़िल्में...

light, sound, action...cut.... अब तीसरे दौर में फिर ये आवाजें हमारे यहाँ गूंजने लगी हैं। दो दौर का अनुभव मिला जुला रहा है। अब तीसरा दौर क्रन्तिकारी होना चाहिए था पर फिल्मों का कंटेंट देखकर लग रहा है की पुराने अनुभवों से भी हमने कुछ नहीं सीखा। मैं शुरू से कहता रहा हूँ छत्तीसगढ़िया सीधा सादा होता है, चूतिया नहीं होता। आप फिल्म बनाते समय ये बात क्यों नहीं सोचते कि जितने पैसे में दर्शक ऐश्वर्या रॉय और केटरीना कैफ , अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ को देखता है, आप भी उतने ही पैसे में परदे पर आते हो, तो फिर उतनी मेहनत क्यों नहीं करते। पटकथा से संवाद और फिर शूट से एडिट और रिलीज़ तक उतनी गंभीरता क्यों नहीं। दूसरे दौर में काम चुतियापे नहीं हुए थे। अब फिर वही नौबत आ गयी है, एक शहर में दो -दो छत्तीसगढ़ी फ़िल्में लगा दी गयी हैं। दोनों एक साथ निपटेंगी। आप धैर्य क्यों नहीं रखते। अब तो पूरा कारोबार सस्ता हो गया है। पहले जब रील का खर्चा होता था तब मुंबई के लोग हमसे कहते थे कि कम्प्लीट फिल्म एक जवान लड़की की तरह होती है, जितनी जल्दी हो सके उसे उसके वारिस को सौंप देना चाहिए। अब तो घर की बात है, पर बचकाने दिमागों को कौन समझाए। प्रतिस्पर्धा आप किससे कर रहें हैं ? अपने पड़ोसी से? क्या मज़ाक है।
आज पहली बार मैं आपको बता रहा हूँ की कितनी फ़िल्में बनी हैं हमारे यहाँ। कई का तो आपने नाम भी नहीं सुना होगा। इन फिल्मों के हीरो हीरोइन आज भी दुपहिया वाहनों में घुमते दिखते हैं । तो पैसा कौन कमा रहा है। कौन है शोषक? खैर छोडो। मैं आपको फिल्मों की लिस्ट बता दूँ। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले बनी थीं कहि देबे सन्देश और घर द्वार । राज्य बनते ही सतीश जैन की फिल्म मोर छैयां भुइयां ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता पाई। इसके बाद तो जिसको मौका मिला फ़िल्में बनानी शुरू कर दी, कुछ को सफलता मिली तो कुछ आज तक इस सदमें से उबर नहीं पाए है। छत्तीसगढ़ की पहली धार्मिक फिल्म बनी जय माँ बमलेश्वरी। इसके बाद ये फ़िल्में लगातार बड़े परदे पर पहुँचीं - मयारू भौजी, मोर सपना के राजा, भोला छत्तीसगढ़िया, मया दे दे मया ले ले , मोर संग चलव, संगवारी, मोर संग चल मितवा, बनिहार, पिरीत के जंग, अंगना, भुइयां के भगवान्, नैना, मोर गंवई गाँव, छत्तीसगढ़ महतारी, मोर धरती मैय्या, परदेसी के मया, जय माँ महामाया, तुलसी चौरा, कंगला होगिस मालामाल, अनाड़ी संगवारी, लेड़गा नंबर वन, मोंगरा, संगी, किसान मितान, जरत हे जिया मोर, मितवा। दुसरे दौर में कारी की पूरी मेहनत भी फिल्म का भाग्य नहीं बदल सकी। फ़िल्मी बाज़ार फिर बैठ गया। तीसरे दौर में सतीश जैन की मया ने फिर बॉक्स ऑफिस को गरम कर दिया। फिल्म तो चली विवाद भी चला। हम शुरू से कह रहे थे की ये फिल्म राजश्री फिल्म प्रोडक्शन की "स्वर्ग से सुन्दर " का रीमेक है, पर लोगों ने हमारी बात को गंभीरता से नहीं लिया और बाद में स्क्रिप्ट चोर सतीश जैन को राजश्री वालों ने कोर्ट में घसीट दिया, सतीश जैन मुंबई में रहे हैं , गोविंदा के लिए भी उन्होंने फिल्म लिखी है, फिर ये सब क्यों किया होगा उन्होंने? खूब पैसे कमाने के बाद करीब तीस लाख में राजश्री वालों ने डील फाइनल की। अब छत्तीसगढ़ी दर्शक किस पर भरोसा करें। प्रेम चंद्राकर को जब तक उडीसा के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर मिलते रहे चाँदी रही। दूसरे दौर में उनकी फिल्म ने भी बता दिया की वो कितने पानी में हैं। खैर आज सब व्यस्त हैं। पहले अनुज कहता था की छोटे कैमरे में काम नहीं करूँगा, अब कर रहा है। पूरी फ़िल्में छोटे कैमरे में ही तो बन रहीं हैं। बडबोला पन कहीं खो गया है। अब चुप चाप काम पर ध्यान देना होगा, बाहर से आने वाली हीरोइनों पर ध्यान देने से छत्तीसगढ़िया दर्शक फिर बिदक जायेगा। नवीन लोढ़ा ने पहले भी एक भोजपुरी फिल्म अनाड़ी संगवारी को छत्तीसगढ़ी में पेला था, दर्शकों ने बता दिया कि अनाड़ी वही था। अब वो फिर अनुज कि भोजपुरी फिल्म "मोर करम मोर धरम " को डबिंग करके बाज़ार में है। फिल्म में अनुज के भाग्य ने साथ दिया तो उसकी कई भोजपुरी फिल्मों में ये प्रयोग हो सकता है। फिलहाल बंधना, मोर करम मोर धरम , और वीडियो वर्ल्ड कि एक अजीब से नाम वाली फिल्म में टक्कर चल रही है। भंवर भी तैयार है। सतीश जैन और प्रेम चंद्राकर आने वाले महीने में फिर टकरायेंगे। प्रेम चंद्राकर ने रायपुर के चर्चित पुलिस अधिकारी शशिमोहन को अपनी फिल्म में अनुज का बाप बनाकर उतरा है। अगर फिर भी ये फिल्म नहीं चली तो कौन डरेगा शशिमोहन से? वैसे फिल्म बहुत अच्छी बन रही है। काफी लगन और मेहनत से काम हो रहा है। गोविंदा स्टाइल कि फिल्म रिक्शा वाला टूरा में भिड़े हैं सतीश जैन। भाग्य का खेल कहलाने वाला फ़िल्मी दौर सबका साथ दे। आमीन.......

12 February 2010

हल्दी की कटोरी.....

मेरा बीस महीने का वनवास ख़त्म हो गया। इन महीनों ने अपने सारे राग रंग मुझे दिए। मैंने कई तरह के संत्रास झेले। आत्मविश्वास भी अर्थाभाव के कारण कई बार डोला। इन बुरे दिनों को अपनी पीढ़ी के लिए लिपिबद्ध कर रहा हूँ। इसी आत्मकथा की शीर्षक का नाम का नाम मैंने सोचा है ''हल्दी की कटोरी... " आप लोगों के मनोबल से मैं फिर कई नयी उर्जाओं के साथ लौट आया हूँ। एकदम आखिरी दौर में जब एक दुर्घटना ने मेरा पैर तोड़ने की कोशिश की तब हल्दी की कटोरी हमशा मेरे साथ रही। मेरे तमाम ब्लोगेर्स , ऑरकुट के दोस्तों का मैं आभारी हूँ कि वे उन दिनों भी मेरे साथ लगे रहे जब मुझे आईडी दिखाकर दस रुपये घंटे में नेट पर बैठना पड़ा। मैं पूरी ईमानदारी से आत्मकथा "हल्दी की कटोरी" लिख रहा हूँ । आशा करता हूँ आने वाली पीढ़ी के लिए ये एक प्रेरणादायक सड़क साबित होगी। अब तो लगातार लिखूंगा। मौत का कोई भरोसा नहीं है इसीलिये मैं "हल्दी की कटोरी" को किश्तों में ब्लॉग पर ही लिखकर उसका प्रिंट आउट निकालता रहूँगा। मुझे पढ़ते रहने वालों का एक बार पुनः आभार.......... और हाँ धन्यवाद भी.

19 January 2010

छत्तीसगढ़ की पुलिस या राजनीतिक सलाहकार...?

राजनीति में जब कोई बड़ा घोटाला होता है सत्ता पक्ष के लोग विपक्ष का कोई पुराना या घिसा पिटा घोटाला उजागर करके अपना घोटाला छिपाने की कोशिश करते हैं। यही करती है छत्तीसगढ़ की पुलिस भी। बड़े बड़े हत्या और डकैती के मामले जब सुलझा नहीं पायी तो फरमान जारी कर दिया कि अब यहाँ स्कार्फ प्रतिबंधित होगा। राजधानी रायपुर में इसकी शुरुआत भी कर दी गयी। मैं स्कार्फ पहनने वालों का ना तो विरोधी हूँ ना हिमायती। विरोध इस बात का है कि पुलिस लोगों का ध्यान क्यों बंटा रही है। अब पुलिस आरोपियों कि पड़ताल करने की बजाय स्कार्फ पर केन्द्रित है। धमकी मिली है कि आगे कड़ाई भी करेगी पुलिस।
हमारे शहर के लोग भी बड़े अजीब हैं धूल से डरते भी हैं और रायपुर में रहते भी हैं। स्कार्फ का फैशन तो शुरू ही नहीं होने देना था। इसकी आड़ में आरोपी पुलिस की नज़र से और जवान लड़कियां अपने घर वालों और अपने पुराने बॉय फ्रेंड की नज़र से बच जा रही हैं। पुलिस को ऐसे लोगों को टारगेट करना चाहिए। स्कार्फ के कारण कई सारी तकलीफें एक साथ बढ़ी हैं। पुलिस को सहयोग की ज़रुरत है। अगर स्कार्फ के अन्दर छिपे आरोपियों को पकड़ना ही है तो ऐसे पुराने सिपाहियों की पोस्टिंग चौक चौराहों पर करनी होगी जो शातिर अपराधियों को पहचानते हैं, कल के रंगरूट सिपाही तो अपने अफसरों तक को नहीं पहचानते। आम लोगों से भी मदद की गुहार लगा रही है पुलिस । पुलिस को अपनी शैली बदलनी होगी, तभी उसे सहयोग मिल पायेगा। जब तक आम आदमी पुलिस को अपना दोस्त नहीं समझेगा तब तक अपराधों को रोकना किसी के बस में नहीं है। अपराधों से बेख़ौफ़ हो गयी राजधानी में मुझे तो व्यक्तिगत रूप से लगने लगा है की पुलिस को कुछ एनकाउन्टर भी करना पड़े तो सरकार को सहयोग देना चाहिए। अब कोई अपराधी गिरफ्तार होता है तो उसका ना तो जुलूस निकला जा सकता ना सरे आम पुलिस गुंडों को मारकर उनकी गुंडागर्दी ख़त्म करने की कोशिश कर सकती। मानवाधिकार के डर ने दब्बू बना दिया है पुलिस को। ऊपर ने नेताओं का दबाव। घर से गुंडे के थाने पहुँचने के पहले कोई ना कोई मंत्री थाने फोन करके कह चुका होता है की अपना आदमी है, चुनाव में मदद करता है, छोड़ देना। ऐसी हालत में अपराधों को रोकने की पहल कैसे होगी। या तो सबको मिलकर कोई सार्थक पहल करनी होगी या छत्तीसगढ़ को भी भगवान् भरोसे छोड़ना पड़ेगा.....