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19 January 2010

छत्तीसगढ़ की पुलिस या राजनीतिक सलाहकार...?

राजनीति में जब कोई बड़ा घोटाला होता है सत्ता पक्ष के लोग विपक्ष का कोई पुराना या घिसा पिटा घोटाला उजागर करके अपना घोटाला छिपाने की कोशिश करते हैं। यही करती है छत्तीसगढ़ की पुलिस भी। बड़े बड़े हत्या और डकैती के मामले जब सुलझा नहीं पायी तो फरमान जारी कर दिया कि अब यहाँ स्कार्फ प्रतिबंधित होगा। राजधानी रायपुर में इसकी शुरुआत भी कर दी गयी। मैं स्कार्फ पहनने वालों का ना तो विरोधी हूँ ना हिमायती। विरोध इस बात का है कि पुलिस लोगों का ध्यान क्यों बंटा रही है। अब पुलिस आरोपियों कि पड़ताल करने की बजाय स्कार्फ पर केन्द्रित है। धमकी मिली है कि आगे कड़ाई भी करेगी पुलिस।
हमारे शहर के लोग भी बड़े अजीब हैं धूल से डरते भी हैं और रायपुर में रहते भी हैं। स्कार्फ का फैशन तो शुरू ही नहीं होने देना था। इसकी आड़ में आरोपी पुलिस की नज़र से और जवान लड़कियां अपने घर वालों और अपने पुराने बॉय फ्रेंड की नज़र से बच जा रही हैं। पुलिस को ऐसे लोगों को टारगेट करना चाहिए। स्कार्फ के कारण कई सारी तकलीफें एक साथ बढ़ी हैं। पुलिस को सहयोग की ज़रुरत है। अगर स्कार्फ के अन्दर छिपे आरोपियों को पकड़ना ही है तो ऐसे पुराने सिपाहियों की पोस्टिंग चौक चौराहों पर करनी होगी जो शातिर अपराधियों को पहचानते हैं, कल के रंगरूट सिपाही तो अपने अफसरों तक को नहीं पहचानते। आम लोगों से भी मदद की गुहार लगा रही है पुलिस । पुलिस को अपनी शैली बदलनी होगी, तभी उसे सहयोग मिल पायेगा। जब तक आम आदमी पुलिस को अपना दोस्त नहीं समझेगा तब तक अपराधों को रोकना किसी के बस में नहीं है। अपराधों से बेख़ौफ़ हो गयी राजधानी में मुझे तो व्यक्तिगत रूप से लगने लगा है की पुलिस को कुछ एनकाउन्टर भी करना पड़े तो सरकार को सहयोग देना चाहिए। अब कोई अपराधी गिरफ्तार होता है तो उसका ना तो जुलूस निकला जा सकता ना सरे आम पुलिस गुंडों को मारकर उनकी गुंडागर्दी ख़त्म करने की कोशिश कर सकती। मानवाधिकार के डर ने दब्बू बना दिया है पुलिस को। ऊपर ने नेताओं का दबाव। घर से गुंडे के थाने पहुँचने के पहले कोई ना कोई मंत्री थाने फोन करके कह चुका होता है की अपना आदमी है, चुनाव में मदद करता है, छोड़ देना। ऐसी हालत में अपराधों को रोकने की पहल कैसे होगी। या तो सबको मिलकर कोई सार्थक पहल करनी होगी या छत्तीसगढ़ को भी भगवान् भरोसे छोड़ना पड़ेगा.....

26 November 2009

हाँ....मैं मुसलमान हूँ....

एक दो ग्रहों ने मुझ पर नज़रें क्या टेढ़ी की, पूरा ज़माना दुश्मन हो गया। सबसे पहला शिकार हुआ मकान मालिक का। मकान मालिक ने अचानक कह दिया- घर खाली कर दो। अपन भी ठसन बाज । निकल पड़े मकान ढूँढने । आज तक किसी की सुनी नहीं। किसी के लेन देन में नहीं पड़े , अपनी बीवी तक का तो ट्रान्सफर नहीं करा पाया, बस जीते रहे, मिशन की पत्रकारिता करते रहे, मेरे सामने आए पत्रकारों ने मकान क्या फ्लैट बुक करा लिए , शिफ्ट भी हो गए , उनका बैंक बैलेंस भी तगड़ा है। उन लोगों ने कार भी ले ली। श्रमजीवी पत्रकार संघ का महासचिव रहते हुए जिन जूनियरों के लिए अधिमान्यता की लड़ाई लड़ी, वो आज अधिमान्य पत्रकारों पर फैसला देते हैं। इसीलिये वहां भी आवेदन देने का मन् नहीं करता। सबको डांटते रहता हूँ ये वाली पत्रकारिता, ज़्यादा दिन नहीं चलेगी। कुछ सीख लो। पढो रे..अच्छा लिखो, कुछ नया करने की कोशिश तो करो। मालिकों के तलुए चाटता तो आज दैनिक भास्कर में संपादक नहीं तो स्थानीय सम्पादक तो रहता ही।
...शायद मैं मुद्दे से भटक गया। बात हो रही थी हाँ मैं मुसलमान हूँ की। ये मुद्दा खड़ा तब हुआ जब मैंने मकान देखना शुरू किया। चालीस प्रतिशत ब्रोकरों ने सीधे हाथ खड़े कर दिए कहा कि आप कहीं और कोशिश करो क्योंकि आप मुसलमान हो और लोग आप लोगों को मकान देने से मकान मालिक हिचकिचाते हैं। कुछ ने तो ये कहकर मेरी चिंता बढ़ा दी कि एक तो आप मुसलमान हो और ऊपर से पत्रकार। बहुत मुश्किल है। कुछ मुस्लिम मकान मालिकों से मिला तो कहने लगे आपकी बातचीत से लगता ही नहीं कि आप मुसलमान हो। खैर..... मुसलमान होने की पीड़ा अभी झेल ही रहा हूँ। लौटकर अपने मकान मालिक से कहा कि आपको मुझसे प्रोब्लम क्या है। उसने तत्काल कहा कि आप महीने में दस दिन लेट लेट आते हो। अब रात में वारदात हो तो क्या बाकी channel के पत्रकारों की तरह घर बैठे ही रिपोर्टिंग करूँ? खैर मैं समझ गया की अगर पत्रकारिता में समझौते किया रहता तो satta जुआ खिलने वाले भी महीने का पैसा पहुँचाने को तैयार थे। मैंने कहीं समझौता नहीं किया । जिस जगह सम्पादक की औकात सिर्फ़ विज्ञापन बटोरने वाले को ordinator की हो वहां काम मांगने भी नहीं गया। रोज़ नए channel के लोग पैसों के बल पर ब्यूरो बनने की बात करते हैं और गन्दी गन्दी गालियाँ मुझसे सुनते हैं। मैं उनसे कहता हूँ की पैसा ज़्यादा हो गया है तो चकलाखाना खोल लो, पत्रकारिता ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? अब कई बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर किया है। ब्लॉग इसीलिये लिख दिया की ये मुझे याद दिलाता रहे की मैं मुसलमान हूँ। मुसलमान होना कोई गुनाह होना थोड़े ही है। गुनाह है किसी धर्म को जाने बिना उसके मानने वालों को हिकारत भरी नज़रों से देखना। अब मेरे अन्दर जेहाद चल रही है कि करूँ तो करूँ क्या?
...अन्दर से ऐसा लग रहा है जैसे कोई फोड़ा पक गया है और अब वो मवाद भी छोड़ने लगा है। मुझे लगता है कि इंदिरा गाँधी जी की हत्या और बाबरी मस्जिद का ढांचा टूटने के बाद ये विवाद बढ़ा है। लोग अब हमको ज़ात से ही जानने और पहचानने लगे हैं। रायपुर में जब दो गुटों में विवाद हुआ था तब भी अमृत संदेश में मुझे रिपोर्टिंग से रोका गया था, लेकिन जब कई पत्रकार अपना हाथ पैर तुडवा कर वापस दफ्तर आ बाए और वापस शहर न जाने की बात की तब मुझे भेजा गया , एक बार अग्रवाल समाज की अन्ताक्षरी में योगेश अग्रवाल ने आयोजकों से कह दिया था की हमारे समाज में कोई मुसलमान क्यों संचालन करेगा। मुझसे अन्ताक्षरी का संचालन सीखने वाली वो अग्रवाल एंकर बहुत रोई थी उस दिन। दरअसल योगेश वहां हीरो बनना चाहता था और उसे अच्छे से पता था कि अगर मैंने संचालन किया तो उसकी कलई खुल जाएगी। वहां जितने भी मुसलमान संगतकार थे , वो भी इस बात से व्यथित हुए और अपना तबला , ओरगन और बाकी सामान उठाकर चलते बने। तब मैंने बड़प्पन दिखाया था और परदे के पीछे रहकर अन्ताक्षरी सफल कराई थी।
...मेरे अन्दर ये बात आज तक घुस ही नहीं पाई की की मैं किसी ऐसी कौम को बिलोंग करता हूँ जिसके लिए लोगों के मन् में इतना गुस्सा या ज़हर भरा हुआ है। मैंने अपने हिंदू दोस्तों के साथ भी कल जब इस बात को लेकर बहस की तो मेरे एक ब्राम्हण दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ कर उठाया और बोला कि आज से भाई मेरे घर में ही रहेगा। माँ ने एक शर्त और जोड़ दी कि खाना भी तुम हमारे साथ ही खाओगे। हिंदू मुसलमान की इसी जद्दोजेहद से बचने मैंने अंतरजातीय विवाह भी किया। उसे भी कभी बंधन में नहीं बाँधा मैंने। मेरा बेटा सलाम भी करता है और नमस्ते भी। मैं उसे भी इस चुतियापे से दूर रखना चाहता हूँ। पत्नी बच्चे राजनांदगांव में ही रहते हैं और मैं हफ्ते के पाँच दिन बैचलर रहता हूँ। पर मोबाइल में दोनों को पल पल की जानकारी देनी होती है.
...दुनिया कहाँ जा रही है और हम आज भी वहीँ अटके पड़े हैं । मुझे रायपुर में मकान नहीं मिल रहा है। दिल्ली - मुंबई में मुस्लिम आतंकियों को मकान मिल जाते हैं अपनी घटनाओं को अंजाम देने के लिए। क्या चल रहा है ये सब? प्राइमरी स्कूल से सरस्वती पूजा का जिम्मा मेरा था। हाई स्कूल से रामायण करना और उसकी रिहर्सल करना मेरा दायित्व था। कॉलेज में सरस्वती वंदना मैंने शुरू करवाई। संगीत महाविद्यालय में सरस्वती की प्रतिमा बड़ी करने और रोज़ प्रार्थना करने की निरंतरता भी मैंने करवाई। डोंगरगढ़ में विराजी माँ बमलेश्वरी की आरती का नवरात्री में जीवंत प्रसारण भी मैंने शुरू किया है। उसी के कारण कई बार जब नवरात्री और रमजान साथ पड़े तो मैंने मैनेज किया। मेरे एक ब्राम्हण दोस्त मधु सुदन शर्मा ने जब छत्तीसगढ़ की पहली आध्यात्मिक पत्रिका भाग्योदय की शुरुआत की तो हमने प्रण किया था की मैं उसमे हर महीने देवी देवताओं के बारे में लिखूंगा। पिछले अंक में मैंने भैरव बाबा के बारे में लिखा तो मेरे हिंदू दोस्तों ने पहली बर भैरव बाबा के बारे में पहली बार इतने विस्तार से पढ़ा और मुझे बधाइयाँ भी मिलीं ...हिंदू- मुसलमान जैसे मुद्दों ने मेरे मन् में आज तक कोई जगह नहीं बनाई , आज जब फ़िर ये सवाल मेरे सामने मुंह बाये खड़ा है तो मुझे फ़िर ये सोचना पड़ रहा है की भारत और उसकी विशेषता भाड़ में जाए। मैंने मुस्लिम घर में जन्म लिया है तो मुझे मानना ही पड़ेगा कि हाँ मैं मुसलमान हूँ। लेकिन एक शब्द यहाँ और जोड़ना चाहूँगा कि मैं भारतीय मुसलमान हूँ जो राष्ट्र के लिए समर्पित है, मुझे पता है कि इस बार ग्रह मुझे समझा कर ही जायेंगे कि तू आदमी अच्छा है लेकिन तेरा समय ख़राब है। ab
एक बात पत्रकारिता वाली। क्या शासन या नगर निगम के पास ऐसे मकान मालिकों के details हैं जो निगम के रेंट कंट्रोल का पालन और अनुपालन करते हैं । किरायेदारों की सूचना कितने मकान मालिक पुलिस को देते हैं? जो सूचना नहीं देते उनके ख़िलाफ़ कोई बड़ी कार्यवाही आज तक हुई है अब इसी मुद्दे को लेकर कोई गरम दल खड़ा हो गया तो उसकी तो चाँदी हो जाएगी . मैं जब तक अपना मकान नहीं ले लेता तब तक इस प्रकरण में मैं तो नेतागिरी नहीं कर सकता । पर एक बात दिमाग में लगातार कौंध रही है..किरायेदार कैदी तो नहीं नहीं होता न?

21 November 2009

कहाँ हैं कलाकार और उनके संगठन.. ?

एक फ़िल्म की शूटिंग के दौरान आग लग गयी, कई कलाकार जल गए। कई अभी भी ठीक से चल नहीं पा रहे हैं। शर्मनाक बात ये की फ़िल्म निर्माता ने इलाज के लिए न खर्चा दिया न हाल चाल पूछा। एक कलाकार कल ही कालड़ा अस्पताल से घर लौटा। मेरी तो जान जल गयी। ठीक है फ़िल्म निर्माता से मेरे भी सम्बन्ध घर जैसे हैं पर फ़ोन कर के मैंने तो उन्हें झाड़ दिया। उन्होंने मुझसे ये भी कहा कि इस मामले में नेतागिरी मत करो। किसी अखबार ने कुछ नहीं छापा। एक बात जो मुझे चुभी वो ये कि तथाकथित दोनों कलाकार संघों को इस बात की जानकारी तक नहीं है। क्या सिर्फ़ लड़कियों को हीरोइन बनाने और फ़िर उनके साथ गुपचुप कर्म करने या उन्हें साथ लेकर घूमने तक ही सीमित है कलाकार संघ।
जैसे ही छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया, अजीत जोगी की कृपा से छत्तीसगढ़ फ़िल्म विकास निगम अस्तित्व में आया। उस समय बागबहरा के विधायक परेश अग्रवाल को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। फ़िल्म विकास निगम ने छत्तीसगढ़ फ़िल्म फेस्टीवल जैसा एक बड़ा आयोजन भी किया था। उस समय की सबसे थकी हुई फ़िल्म भोला छत्तीसगढ़िया को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म घोषित किया गया था। भोला.......न चली न लोगों ने पसंद किया, लेकिन पुरस्कार उसे इसीलिये मिला क्योंकि उसके निर्माता परेश अग्रवाल थे। उनका भतीजा अंकित इस फ़िल्म का हीरो था। यानि छत्तीसगढ़ बना और कलाकारों में नेतागिरी शुरू हो गयी थी। कांग्रेस की सरकार जैसे भी गयी। भाजपा की सरकार बनी तो बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई योगेश अग्रवाल ने अपने चंगु मंगू लोगों के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ आर्टिस्ट एसोसिएशन बना डाला। फ़िर शुरू हुआ संस्कृति विभाग से लेन देन का सिलसिला । लाखों रुपये कलाकारों के नाम पर कमाए गए। कुछ काम हुए तो कुछ अभी भी पेंडिंग हैं। एडवांस तो निकल गया है। अब सरकार के पास और भी तो काम है। कौन पूछेगा पैसे का क्या हुआ।
इसी बीच मैंने पहल की और कलाकारों को एकजुट कर उन्हें समझाया कि खाली मंच और एल्बम पर एक्टिंग या नाच गाने से कुछ नही होगा। सरकार , संस्कृति विभाग और कलाकारों के संबंधों को मैंने कई बैठकों में समझाया। उन्हें संस्कृति मंत्री का घर और संस्कृति विभाग का दरवाज़ा भी दिखाया । एक और कलाकार संघ (आलाप) अस्तित्व में आ गया। मुझे संगठन चलाने का अच्छा खासा तजुर्बा था। हमने bhi prakashit किया। rajyapal से विमोचन भी करवाया। कलाकारों के हाथ में पेन भी पकड़वाया। सब कुछ ठीक चल रहा था, इसी बीच मुझसे कई बातें छुपाई जाने लगीं । मैंने हाथ खड़े कर दिए, हमेशा की तरह ... मेरे कारण अध्यक्ष लक्ष्मण चौहान ने इस्तीफे की पेशकश भी की, मैं सबको समझाता रहा। सचिव अनुमोद को भी मैंने कई बार समझाया की संगठन चलाना मज़ाक नहीं है। उसके आसपास भी खाली कलाकार बढ़ने लगे और उसको लगने लगा कि अब वह कलाकारों का नेता बन गया है।
हमने संस्कृति विभाग को साफ़ कर दिया कि अब योगेश की संस्था को कोई कार्यक्रम मिलेगा तो हमें भी कार्यक्रम देना पड़ेगा । सब कुछ ठीक ठाक था, अचानक एक प्रोग्राम के दौरान अनुमोद और लक्ष्मण में विवाद हुआ। लक्ष्मण ने इस्तीफ़ा दे दिया और मेरे परम मित्र प्रदीप ठाकुर को अध्यक्ष बना दिया गया। खैर, मुझे अकेले चलना और अपनी पहचान बरकरार रखना आता है। लेकिन मूल मुद्दे से जब कथित कलाकार संघ भटकते हाँ तब खीज होती है। दस दिन पहले जब फ़िल्म के सेट पर आगज़नी हुई, और कलाकार जल भुन गए तब कोई कलाकार संघ आगे क्यों नहीं आया? कहाँ हैं कलाकार और उनका संगठन?

06 November 2009

प्रभाष जी , आप जिंदा हैं...

ज़िंदगी की कुछ हसरतें कभी पूरी नहीं होतीं। प्रभाष जी से मुलाकातें तो हुईं पर उनका कभी सानिध्य नहीं मिला। एक ऐसे वरिष्ठ साथी थे प्रभाष जी, जिन्होंने लिख लिख कर हम जैसे लोगों को पढने पर मजबूर किया। आज सुबह सुबह भड़ास ४ मीडिया का जैसे ही एसेमेस आया। दिल बैठने लगा था। भावुक लोगों के साथ कई दिक्कतें होती हैं। और ऐसे में अपनी बिरादरी का बाप जैसे एक गुरु ( उनकी लेखनी से उनका शिष्य ) का देहावसान एक ह्रदय विदारक मामला था। दिन तो जैसे तैसे कट भी गया। शाम को जब राज्योत्सव जाने की बारी आयी तो मन् फ़िर भारी हो गया। अपनी ही बनाई कलाकारों की संस्था आलाप ( जिसमें आज मैं कहीं नहीं हूँ ) के शो लिए मुझे आमंत्रित किया गया था। वहां भी जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। कुछ सहयोगी समझाते रहे। एक की बात मुझे लग गयी। सहयोगी ने कहा था, जब आप मर जाओगे तब भी राज्योत्सव रुकेगा नहीं।
ये बड़ी विडम्बना है देश की। जो लोग नेता बनाते हैं, उन्हें ग़लत और सही की जानकारी देते हैं , ऐसे लोगों की मौत पर कोई शोक नहीं होता। नेता मर जायें तो बाप रे बाप॥ खैर बहुत से लोगों ने बहुत कुछ लिखा है प्रभाष जी के बारे में। सच कहूँ तो उनके बारे में कुछ लिखने की औकात भी नहीं है मेरी। लेकिन दिल भारी था तो सोचा एक बात तो लिख ही दूँ जो शायद कोई नहीं लिखेगा। प्रभाष जी , आप जिंदा हो। अब हमारी कलम भी आपके हवाले। हम जैसे कुछ मिशन वादी पत्रकारों के मन् में आप सदैव जीवित रहोगे। आप जिंदा हो प्रभाष जी॥ आप जिंदा हो.

05 November 2009

अग्रवालों को निपटा रहे हैं श्रीवास्तव

जब छत्तीसगढ़ राज्य बना और जोगी की का आक्रामक रुख हम लोगों ने देखा तो ऐसा लगने लगा था कि छत्तीसगढ़ में रहना है तो इसाई बनना बेहतर है। आम आदमी का डर आकाश चैनल में रहकर अपनी आंखों से देखा है मैंने। बाद में जब जोगी जी से थोडी घनिष्ठता बढ़ी तब लगा आदमी वैसा नहीं है। कई बार अपने चेहरे पर आवरण चढाना भी पड़ता है। वही हाल अनिल पुसदकर का भी है और हाँ मेरा भी। हम लोगों की फितरत वैसी नहीं है पर हम जानते हैं जिस दिन हम लोगों ने अपना मुंह और कलम शांत की उस दिन कुत्ते बिल्ली की तरह लोग हमें नोच खायेंगे। मैं ये तुलना इसीलिये कर रहा हूँ की हमारी सोच एक जैसी है इसीलिये हम साथ में काम नहीं करते। अपने दुश्मनों को निपटाना कोई बुरी बात थोड़े ही है। डॉक्टर रमन सिंह के चेहरे से बहुत प्यार करता हूँ मैं। मेरा बेटा भी वैसा ही गोपू गोपू है. हमेशा उसे देखकर गाल चिमटने और प्यार करने की इच्छा होती है
डॉक्टर साहब वैसे भी बुरे नहीं हैंउनके मंत्रिमंडल और अफसरों ने एक अग्रवाल लॉबी को जानबूझकर खड़ा कर दिया हैराजिम कुम्भ में जब डॉक्टर साहब को ये जानकारी मिली तो बजट पर लगाम कसी थी उन्होंनेइस बार राज्योत्सव में एक अफसर ने अपने ही विभाग के अग्रवाल मंत्री के विरुद्ध एक षडयंत्र रचा हैपुलिस विभाग से आए इस अफसर को शायद इस बात का भान नहीं है कि उस मंत्री के समर्थक पूरी छत्तीसगढ़ की पुलिस से भी ज्यादा हैंइस अफसर ने श्रीवास्तव , वर्मा और इन्ही श्रेणी के लोगों को इस बार राज्योत्सव में लगाया है, ये लोग भी निजी तौर पर एक एग्रीमेंट के तहत जोड़े गए हैंआने वाले समय में स्थिति विस्फोटक होगी हीब्लॉग इसीलिये लिख दे रहा हूँ ताकि बाद में लोग ये बोलें कि तुम्हे पता था तो बताया क्यों नहींये भी सम्भव है कि जातिवाद का ज़हर छत्तीसगढ़ में घोलने वालों के विरुद्ध कोई सेना तैयार हो जाएसब जानते हैं अफसर आते जाते रहते हैं मंत्री को तो यहीं रहना हैअब ये बात अफसर नहीं जानते या जान बूझकर ऐसा कर रहे हैं तो प्रभु श्रीराम ही उनकी नैय्या पार करेंजय श्री राम

03 November 2009

मंत्री के भाई के लिए होता है राज्योत्सव?

दीन - दुनिया से दूर सूफी गायक कैलाश खेर के साथ छत्तीसगढ़ के नवें राज्योत्सव के दौरान जो कुछ भी हुआ वो न सिर्फ़ छत्तीसगढ़ के लोगों के किए शर्मनाक है बल्कि कलाकारों के लिए भी हैरतंगेज बात है। पूरे रायपुर के लोग जानते हैं की रायपुर शहर में दो केबल चल रहे हैं । यानि आधा आधा शहर उनकी अवैध खबरें और कार्यक्रम देखता है। अवैध शब्द का इस्तेमाल केबल एक्ट १९८६ के तहत लिखा गया है। खैर... केबल एक्ट का ज़िक्र इसीलिये करना पड़ा क्योंकि एक केबल में संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का भाई भी २४ घंटे का एक channel चलाता है। इसी channel के लिए जब कैलाश खेर ने बातचीत करने से मना कर दिया तो उसकी फजीहत हुई।
हम तो लगातार देख रहे हैं । अब तो ऐसा लगने लगा है की राज्योत्सव का आयोजन सिर्फ़ मंत्री के भाई योगेश अग्रवाल और उसके चंगु मंगू लोगों को काम देने के लिए ही किया जाता है। संस्कृति विभाग सिर्फ़ उन्ही लोगों को काम दे रहा है, जो योगेश के करीबी हैं। आयोजन के लिए क्या छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों का अमला कम पड़ता है, जो उन्हें बाहर से co- ordinator जैसे पद का समायोजन करना पड़ता है? पूरे आयोजन का काम मंत्री के भाई के लोग कर रहे हैं। मैं सूचना जानने के अधिकार के तहत पूरी सच्चाई का पता करके आप सभी लोगों को सारी सच्चाई बताऊंगा,।
अपना राज्य है, अपना राज्योत्सव , तो फिर मुंबई के कलाकारों की ज़रूरत क्या है। और अगर ज़रूरत है भी तो ज़रूरी है की मंत्री का भाई या उनके चम्मच ही ये काम करें।

21 October 2009

सपना पूरा हुआ.. जोसेफ भैय्या का..

जब मैं पैदा हुआ , तब जोसेफ भैय्या नवभारत में सिटी चीफ हुआ करते थे। मुझे पता है कि उम्र तजुर्बे के आड़े कभी नहीं आती। मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे गुरु हमेशा अच्छे मिले। नाटकों से जुडा तो स्वर्गीय हबीब तनवीर मेरे सामने थे। संगीत की शिक्षा पाने गया तो सरस्वती देवी जैसी माँ स्वर्गीय डॉक्टर अनीता सेन साक्षात थीं और यहीं आर्शीवाद मिला सोहन दुबे जी का। छायांकन और सम्पादन की बारी आयी तो जमाल रिज़वी और कन्हैया पंजवानी ने मुझे हाथों हाथ लिया। पत्रकारिता से जुडा तो एम् ए जोसेफ के दर्शन हुए। भगवान ऊपर से लाख कोशिश कर ले, नीचे के लोग एक अलग दुनिया जी रहे होते हैं। धर्म , कर्म , जात और संप्रदाय से कोसों दूर। मुझे ईश्वरीय आर्शीवाद ही था जो मुझे अच्छे गुरुओं का सानिध्य मिलता रहा । आज जो भी पढ़ लिख रहा हूँ वो जोसेफ भैय्या का ही आर्शीवाद है। अगर वो मेरी लिखी ख़बर को बार बार फाड़ कर कचरा दान में नहीं डालते या ज़मीन पर नहीं फेंकते तो आज मैं अच्छा पत्रकार नहीं होता, उस समय बुरा ज़रूर लगता था लेकिन आज बहुत अच्छा लगता है। मैं जब भी कोई ख़बर उनके सामने लिख कर रखता मेरी साँस अटकी रहती थी, पता नहीं क्या बोलेंगे। फेंक कर कहेंगे फ़िर से लिखो। उनके साथ कई अखबारों में काम करने का मौका मिला। वो हर जगह मेरी सिफारिश करते। जब प्रखर टी वी शुरू हुआ तो उन्होंने मुझसे साफ़ कहा था कि अब तेरा ऋण चुकाने का वक्त आ गया है, मैं फ़िल्म , वृत्त चित्र निर्माण और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बहुत आगे जा चुका था । उन्होंने मुझसे कहा था अब ये काम तू मुझे सिखा ।
....खैर ये तो हुई पुरानी बात। लेकिन सच ये है आज जिस ओवर ब्रिज का शिलान्यास मुख्यमंत्री ने किया उसका सपना जोसेफ भैय्या ने ही देखा था। नवभारत के बाद वो जहाँ भी गए। सब जगह उन्होंने इस बात के लिए आवाज़ बुलंद की कि टाटीबंध के पास एक ओवर ब्रिज का निर्माण होना ही चाहिए,.आज उनका सपना साकार हुआ है। मैं आज ख़ुद ओवर ब्रिज घूमकर आया हूँ । मेरी सदिच्छा थी कि मेरे गुरु का सपना पूरा हो , लेकिन दलाल पत्रकारों के बीच हम अपनी बात रख नहीं पाये।
हर इंसान का एक सपना होता है। आज उनका सपना पूरा हुआ। कुछ साल पहले भाभी जी की मौत के समय भी हम साथ थे। कई बार हमें लगता था कि जोसेफ भैय्या अपने स्वार्थ के लिए लिखते हैं , लेकिन आज जब वहां जाकर लोगों से बातचीत की तो लगा कि ये सपना सबका था, लेकिन आवाज़ बुलंद करने वाले जोसेफ भैय्या ही थे। उस समय पत्रकार की हैसियत कलेक्टर से कम नहीं थी। मोहल्ले में किसी पत्रकार का रहना पूरे मोहल्ले के लिए महफूज़ समझा जाता था। छोटी छोटी सी बात पर पूरा मोहल्ला पत्रकार के घर पहुँच जाता था। तनख्वाह भले कम थी पर जलवे में कोई कमी नहीं आती थी।
हम कई बार उनकी पीठ के पीछे उनकी बुराई किया करते थे कि जोसेफ भैय्या मूर्खता कर रहे हैं। ख़ुद अपने आने जाने के लिए ओवर ब्रिज कि मांग कर रहे हैं। उस समय वहां कि सूनसान पड़ी सड़कों पर विद्युत व्यवस्था पर भी खूब लिखते थे जोसेफ भैय्या।आज उनका सपना पूरा हुआ। इस सपने की एक हकदार भाभी जी हमारे बीच नहीं हैं फिर भी हम उन्हें नम आंखों से बिदाई देते हुए हौसला रखते हैं कि दृढ़ विश्वास के साथ सोचे हुए सपने आज नहीं तो कल साकार होकर ही रहेंगे।