11 April 2010

कौन है नक्सलियों का "सहारा"...

शहीद जवानों के शव और बचे जवानों का खून से लथपथ शरीर देखकर न कुछ लिखने का मन् कर रहा था न कुछ सोचने का, अब थोड़ा शांत हुआ है दिमाग। अब सवाल ये उठता है कि पुलिस नक्सलियों के शहरी नेटवर्क पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है। सारा गणित तो शहर से होकर नक्सालियों तक जाता है। देश की सबसे बड़ी नक्सली वारदात ने हिलाकर रख दिया सबको। चैनलों में होड़ मची रही, लेकिन सहारा समय ने तो हद्द कर दी। बची खुची कसर साधना न्यूज़ ने निकाल दी। सहारा समय के संवाददाता उस दिन रायपुर में थे और फ़ोनों में पट्टी चल रही थी कि वो दंतेवाडा से बात कर रहे हैं। अगर संवाददाता यहाँ थे तो किस मजबूरी से चैनल ने ऐसा किया। अगर संवाददाता दंतेवाडा में थे तो फ़ोनों के तत्काल बाद वो अचानक रायपुर में कैसे दिखने लगे? कोई हेलीकाप्टर रेंट में लिया था क्या सहारा ने उस दिन के लिए ? , सबसे पहले ओबी वैन भी सहारा के पहुँचने की खबर थी, थोड़ा जांच पड़ताल किया तो पता चला कि आज तक इनकी ओबी वैन वहां नहीं पहुंची है। राष्ट्रीय - अन्तराष्ट्रीय चैनल के लोग दनादन रायपुर आकर जगदलपुर और दंतेवाडा रवाना होने लगे और सहारा की ओबी वैन गायब? ऐसा कैसे हो गया? अगर टिकर गलती से चल रहा था तो संशोधन भी तो किया जा सकता था।
सब बदला निकाल रहे हैं क्या? नक्सलियों ने जवानों से बदला निकाला, विपक्ष ने सरकार से और पत्रकारों ने पत्रकारों से। गुरुकुल आश्रम का विवाद अभी सुलझा ही नहीं था और सहारा के पत्रकार एक नए विवाद में घिर गये। कितना टी आर पी बढाओगे? विवाद भी तो बढ़ रहा है? कौन समेटेगा इसे? ऊपर से कोई नहीं आएगा। स्पर्धा की दौड़ में साधना के संवाददाता ने एक नक्सली नेता का फ़ोनों करवा डाला। वेरी गुड। नक्सलियों की स्वीकारोक्ति वाली विज्ञप्ति भी सिर्फ सहारा के पास ही पहुंची। बाकी अखबार और चैनल विज्ञप्ति का रास्ता ही देखते रह गये। क्या चल रहा है पत्रकारिता की आड़ में। अब तो पुलिस की ज़िम्मेदारी और बढ़ी है, किसका डर है पुलिस को? क्यों पूछताछ नहीं करती पुलिस? नक्सलियों का कोरिअर पहुँचाने वाले पियूष गुहा को किसने रुकवाया था रायपुर में , ऐसे कई सवाल हैं जो अब शहीद जवानों के रक्त रंजित शव पूछ रहे हैं। कौन देगा जवाब?
केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने आखिर इस्तीफे की पेशकश तो की। लेकिन छत्तीसगढ़ के मंत्रियों के कान में जूँ तक नहीं रेंगी। भारतीय जानता पार्टी की स्थापना बैठक में आतंरिक रूप से ही इस्तीफ़ा मांग लेते, फिर स्वीकार नहीं करते। एक सन्देश तो जाता। अपने घर में कोई मरता है तो सालों साल उनकी कसक साथ रहती है, देश के जवान शहीद हुए तो कोई ग़म नहीं ..... मर गयी है आत्मा सबकी। विपक्ष भी कम नहीं है। बंद करा देने से सुलझ जायेगा मामला? मुझे तो व्यक्तिगत रूप से लगता है की छत्तीसगढ़ में मिली जुली सरकार चल रही है? जिसके मन् में जो आ रहा है कर रहा है, राम राज्य देखना है तो आ जाओ छत्तीसगढ़। ऐसी सिधाई किस काम की जो सरकार को नपुंसक बना दे।
अब पूरे मामले की जांच हो रही है, दोनों सरकारें पहले दिन से कह रही हैं की गलती सी आर पी ऍफ़ के जवानों की है, बिलकुल ठीक कहा दोनों ने। वाकई में अपना घर बार छोड़कर जंगल में नौकरी करना गलती है जवानों की। क्यों करते हो सर्चिंग करने की गलती? जब पता है सरकार ढुलमुल है, तो क्यों गये होशियारी दिखाने? सब ख़त्म हो गया ना? एक दिन पहले तक तो तो रायपुर से दिल्ली तक यही गूँज थी की नक्सलियों का सफाया कर देंगे २ साल में, ऐसे उटपटांग बयान देने की ज़रुरत क्या है। मेरी तो पैदाइश यहीं की है, जब से पत्रकारिता से जुड़ा हूँ रोज़ सुन रहा हूँ हेलीकाप्टर आएगा तो सर्चिंग तेज़ होगी। हज़ारों लोग तो शहीद हो गये, कब आएगा हेलीकाप्टर, नक्सली भी भटके से लगते हैं। उनका टार्गेट कौन है, क्या है । वो जवान जो अपने घर से हजारों किलोमीटर अपनी बीवी बच्चों को छोड़कर देश सेवा कर रहे हैं। वातानुकूलित चम्बर में बैठकर रणनीति बनाने वालों को अब पता चल गया होगा की जंगल में किसी की नहीं चलती, अपनी सुझबुझ ही काम आती है। आख़िरकार छत्तीसगढ़ के डी जी पी को कैंप करना पड़ा जंगले में। घूमे मोटर साइकल में । पता चल गया होगा जंगल में कितनी गर्मी होती है, ऐसे में जब दिल सुलग रहे हों तो गर्मी और भी तंग करती है , कान के पीछे से पसीना जब शुरू होता है तो रुकने का नाम नहीं लेता. बातें बहुत हुई अब काम की बात पर सबको ध्यान देना होगा, नक्सलियों के शहरी नेटवर्क पर पुलिस को ध्यान केन्द्रित करना ही होगा, तभी बड़ी सफलता संभव है। अब शहीदों के शव ढोते कंधे दुखने लगे हैं. सबको मिलजुलकर पहल करनी होगी. बयान बाजी बंद करनी होगी. कुछ सवाल मैंने ओन वीडिओ पूछा है, अपने मुख्यमंत्री से। utube में जाकर ahfazrashid टाइप करके या मेरे पोर्टल media-house.org पर भी आप ये संक्षिप्त बातचीत देख सकते हैं। जय हिंद , जय भारत , जय छत्तीसगढ़..

12 March 2010

पहले अनाथ पत्रकारों को तो सम्हाल लो...

प्रेस क्लब का अध्यक्ष क्या राष्ट्रपति होता है ? वो भी अवैध ....चार साल तक बेशर्मी से... क्या हो गया है रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर को? आज कुछ अख़बारों में उनका बयान पढ़ा । अपने बयान में उन्होंने कहा है की प्रेस क्लब गुरुकुल आश्रम के बच्चों के साथ है। मैं तो पहले दिन से कह रहा था कि उन बच्चों को इस पचड़े से दूर रखो। प्रेस क्लब की अनाथाचारी तो ख़त्म कर नहीं पा रहे हैं , अब अनाथ बच्चों पर ध्यान देंगे। स्वर्गीय पत्रकार कुलदीप निगम आज जिंदा होते तो ये नौबत ही नहीं आती। तकनीकी कारणों का हवाला देकर पत्रकारों को कब तक दिलासा देते रहेंगे अनिल जी। अब वक्त आ गया है। बुरे वक्त काटकर मैं और भी ज्यादा उर्जावान हुआ हूँ।
बहुत दिन से सोच रहा था कि अनिल पुसदकर के बारे में भी लिखूं। फिर सोचा और भी तो ग़म हैं ज़माने में। राजधानी का प्रेस क्लब है। कौन गरिमा का ध्यान रखेगा। जब मैंने नक्सली - पत्रकार पुलिस भाई भाई लिखा तो अनिल भैय्या का कॉल आया था, बोल रहे थे कि राव तो चोर है। मैंने कहा - होगा, मेरा टार्गेट तो सहारा , रुचिर और राजीव ब्रिगेड हैं। मैं ज्यादा चोर उचक्कों के बीच रहा नहीं हूँ इसीलिये इस फील्ड के बारे में ज्यादा नॉलेज नहीं है। अनिल भैय्या को कोई स्टेप उठाना था तो वो ये कि सहारा के जिन पत्रकारों के कारण मासूमों को रोना बिलखना पड़ रहा है, उन्हें प्रेस क्लब से निष्कासित कर देते, पर वो नहीं करेंगे। कारण - गद्दी हिल जाएगी। मुझे तो लग रहा है कि राजधानी के पत्रकार अपना ध्यान राजनीति में ज्यादा और पत्रकारिता में कम लगा रहे हैं। हरिभूमि के पत्रकार राजकुमार सोनी को इस मामले में क्या रूचि थी? खैर उसने मानवीय धर्म निभाया है और अपने प्रतिस्पर्धियों को टक्कर भी दी है। भले ही उसके कारण रुचिर का ख़ास ब्रम्हवीर खून के घूँट पीकर हरिभूमि में समय काट रहा हो। सहारा के विवादास्पद पत्रकारों को निलंबित करने की बजाय प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने निशाना बनाया पी सेवन के पत्रकार गिरीश केशरवानी को। वो गरीब हाथ में कुछ फार्म लेकर आया था, बस भड़क गये , भगा दिया उसे प्रेस क्लब से । बाद में पता चला कि पी सेवन के हेड अजय शर्मा फिर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकारों का कोई संगठन खड़ा कर रहे हैं। बस ये बात उन्हें नागवार गुजरी। अजय भैय्या की तो आदत है, ऐसे तमाशा करके गाली खाने की। अब उनका नया शगल है- इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोशियेशन ऑफ़ छत्तीसगढ़। सब जगह फार्म भेज रहे हैं वो। मेरे पास नहीं भेजे हैं अभी तक। जानते हैं मेरी आदत। काम क्यों नहीं करते ये लोग। संगठन बना लोगे तो क्या हो जायेगा। पी सेवन या १८ के नाम से वसूली अब नहीं हो पा रही है क्या? अपनी हैसियत तो बना लो कि मंत्री लोग आप लोगों को देखकर भागें मत।
मैं अनिल भैय्या को दो साल से बोल रहा हूँ कि प्रेस क्लब का चुनाव अगर किसी तकनीकी कारण से नहीं हो पा रहा है तो एक इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सेल बना लो। पर वो ऐसा भी नहीं करेंगे। दो श्रमजीवी पत्रकार संघ एक दुसरे का कपडा फाड़ ही रहे हैं। ऐसे में महासंघ कि क्या ज़रुरत आन पड़ी? चलो संगठन बन भी गया तो उसे ढंग से चलाते ना? शशि कोन हेर ने इस संगठन को बिलासपुर में सीमित कर दिया ना?
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार तो अब किसी को श्रद्धान्जलि देने भी प्रेस क्लब आना पसंद नहीं करते। क्या से क्या हो गया है प्रेस क्लब। हम सब ज़िम्मेदार हैं इसके लिए। अख़बार बांटने वाले हाकर पदाधिकारी बने बैठे हैं । बेशर्मी से दांत निपोरते हुए। हम लोगों को क्या है, हम तो रात को जाते हैं । हम तो नाईट के मेम्बर हैं। अनिल पुसदकर के प्रोफाइल में पढ़ा की वो चार साल से लगातार प्रेस क्लब के अध्यक्ष निर्वाचित होते रहे हैं। कब और कहाँ हुआ ये निर्वाचन? चौबे कालोनी में? कोई डेट वेट याद है। कोई रजिस्टर है? कुछ भी चल रहा है। प्रेस क्लब तो चारागाह हो गया है। आधे से ज्यादा पत्रकार तो वहां बैठकर ज़मीन की दलाली से जुड़ गये हैं। दो महीने से मैंने भी वहां दिन में जाना बंद कर दिया है। मुझे कैसे भगाओगे ? हाँ इस ब्लॉग को पढने के बाद बैठक ज़रूर बुला सकते हो। कौन आएगा बैठक में? वही ब्राम्हण पारा के चुनिंदे नुमाइंदे? बंद कमरे में कर लोगे फैसला? चलो कर के दिखाओ। मैं तो खुद कोर्ट जाना चाह रहा हूँ। पर कुछ कागज़ हाथ में होना चाहिए ना? बहुत दिन बाद कल कुछ अखबार और चैनल के दफ्तर का मौका मिला। वहां पता चला कि हम लोगों का जनसंपर्क क्या टूटा अपने ही लोग पीठ पीछे बुराई करने में लगे हैं। आज से हम सारे प्रेस जायेंगे, अब अलख जागेगी चुनाव की। अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने वालों की हम लेंगे खबर। इलेक्ट्रोनिक मीडिया का कीड़ा होने के बावजूद हम घर बैठे हैं और लोग ऐश कर रहें हैं। ये मेरी कुंठा नहीं, व्यथा है। कुंठित वो होते हैं जिन्हें कुछ आता जाता नहीं , जिन्हें हमेशा नौकरी जाने का खतरा बना रहता है। हम तो नवरात्री के एकम से मीडिया हाउस जोर शोर से शुरू करने कि तैय्यारी कर रहे हैं। न्यूज़ पोर्टल फाइनल हो चुका है। हम स्टोरी कि बैंकिंग भी कर चुके। अब हम बताएँगे खबर और खबर के पीछे की खबर। बस थोड़ा सा इंतज़ार ..........

09 March 2010

क्यों लौट आयी मेरी लव बर्ड...?




कल सुबह से मन् हलाकान था। दिनचर्या गड़बड़ा गयी थी। सुबह उठकर चारों लव बर्ड को पिंजरे सहित बालकनी में ले गया। उनका कुण्डी थोड़ा सा खोला और उनके लिए दाना लेने अन्दर आ गया। अन्दर आकर कंप्यूटर से चिपक गया, अक्सर ऐसा होता था। दो घंटे बाद अचानक याद आया कि लव बर्ड्स के दाने का बर्तन साफ़ कर दाना देना है उन्हें। पिंजरे के पास गया तो मेरी हालत ख़राब हो गयी। बुरे समय में मेरा साथ देने वाली तीन लव बर्ड उड़ चुकी थीं । एक बची थी और पिंजरे का दरवाज़ा तेज़ हवा के कारण बार बार खुल रहा था, मैंने पूरा खोल दिया। मुझे पता है कि लव बर्ड अकेले नहीं रहते। मैंने उससे भी कहा कि जाओ तुम भी उड़ जाओ। मन् भारी था फिर भी मीडिया हाउस कि स्टोरी एडिट करने बैठ गया। सोचा, मन् को बहलाने का इससे अच्छा उपाय कोई नहीं है। शाम होने को आयी। अपनी दिनचर्या के अनुसार पिंजरा अन्दर करने बालकनी में गया तो लव बर्ड पिंजरे के अन्दर ही थी। मैंने उसे भी उड़ा देने की ठान ली। अन्दर हाथ डालकर उसे पकड़ना चाहा तो उसने मेरे हाथ पर अपनी चोंच गड़ानी शुरू कर दी। मैंने तौलिये की मदद से उसे पकड़ा और पिंजरे से निकाल कर आज़ाद कर दिया उसे.......
आज सुबह बिट्टू का कॉल आया कि जल्दी से नीचे आओ। अपनी एक लव बर्ड नीचे घूम रही है, वो उड़ नहीं पा रही है। मैं फिर छोटा तौलिया लेकर दौड़ा। उसे पकड़ने लगा तो उड़ने लग गयी। फिर एक जगह पर चुपचाप बैठ गयी। मैं उसे डांटने लगा कि तुम तीन तो एक साथ भागे थे ना, बाकी कहाँ हैं। मैंने हाथ दिया तो हथेलियों में आकर बैठ गयी। घर लाकर उसे अपने बेडरूम में खुला छोड़ दिया। मेरे पिंजरे में अब उसका कब्ज़ा हो गया। मैंने दाने की कटोरी में दाना डाला और पानी की कटोरी भी भर दी। उसके पास जैसे ही दोनों कटोरियाँ रखीं वो टूट पड़ी खाने पर..... गटागट पानी भी पीने लगी। मेरा मन् पसीज गया। मैं समझ गया की बाहर क्या हालत है पक्षियों की। गर्मी बढ़ रही है, हम एयर कंडीशन या कूलर में खुद तो महफूज़ हो जाते हैं लेकिन पशु पक्षी बेचारे भटकते रहते हैं। इनके संरक्षण के नाम पर सरकारी सांड अपना पेट भर रहे हैं। कई बार कुछ पशु पक्षी प्रेमियों ने एस एम् एस भी किया कि अपने घर के बाहर पशु - पक्षियों के लिए दाना पानी रखो, कुछ ने पहल की तो कुछ ने इसे इग्नोर कर दिया। खैर ....मैं आज बहुत खुश हूँ कि मेरा प्यारा एक लव बर्ड तो मेरे पास वापस आ गया। हो सकता है, बाकी लोग भी भूख प्यास से तंग आकर वापस घर आ जाएँ। मैं चाउंर वाला बाबा तो नहीं हूँ लेकिन बुरे वक्त में जब इन लोगों का दाना ख़त्म हो जाता था तो बहुत रोता था। ऊपर वाले से कहता था कि मैं तो भूखे प्यासे रह लूँगा तू इनकी परीक्षा क्यों ले रहा है। और दो - तीन घंटों में कहीं ना कहीं से दाना आ ही जाता था। अब जब दिन ठीक हो रहे हैं तो क्यों भागे होंगे पक्षी? अब चले गये थे तो वापस क्यों आ रहे हैं। ऊपर वाले की महिमा मैं अच्छे से समझ गया हूँ । वो जो ना करे कम है। परीक्षा ली मेरी और मैं भी सप्लीमेंट्री भर भर कर लौटता रहा। मैंने तय भी कर लिया है जिसे मेरे साथ ठीक से रहना है रहे, नहीं तो जहाँ जाना हो जाए। मुझे समय ने साफ़- साफ़ कह दिया है, बेटा अकेले आया है , अकेले जी और अकेले चले आना।

06 March 2010

नक्सली- पुलिस-पत्रकार भाई भाई?....

आखिरकार वो आदमी जेल चला गया, जो नक्सली हमलों में मारे गये बच्चों का सहारा था , मददगार था उनका। ५९ बच्चों का गुरु पापा था , लेकिन सहारा ने ही उसे बेसहारा कर दिया। बहुत अच्छा काम किया सहारा समय ने, ऐसे लोगों को निपटाना ही चाहिए जो नक्सलवाद के आड़े आयें। समाजसेवी बनता था साला। बच्चे बेचेगा। मज़ा आ गया, पुलिस ने भी क्या तत्परता दिखाई। इस घटना से ऐसा भी लगने लगा है कि नक्सली- पुलिस - और पत्रकार भाई भाई तो नहीं होते जा रहे।
राजीव ब्रिगेड के लोग भी बधाई के पात्र हैं। नाम राजीव ब्रिगेड और काम ? सूचना जानने का अधिकार? क्या करते हैं रोज़ ये लोग? सहारा के दफ्तर में रोज़ की उठक बैठक क्या साबित करती है? पत्रकारिता की आड़ में क्या हो रहा है ये सब? छोटे छोटे मामलों में वरिष्ठ पत्रकारों की दखल , क्या चल रहा है। अगर बड़ा मामला था तो लोकल चैनल और अखबार वाले क्यों बंटने लग गये। मुझे याद नहीं कि कभी सहारा ने वहां की ये खबर दिखाई हो की एक ऐसा इंसान भी शहर में है जो नक्सलियों से नहीं डरता और उनकी करतूतों से अनाथ हुए बच्चों को पालने का दंभ रखता है। हाँ ई टीवी ने कई बार फोकस किया है। times now की टीम तो दंतेवाडा तक जाकर ऐसे बच्चों का साक्षात्कार कर आयी है । खबर तो खबर होती है, बस नजरिया चाहिए। पर जब नज़रों में अर्थ का चश्मा चढ़ जाये तो कुछ नहीं दिखता।
टी आर पी भी बढ़ गयी होगी सहारा समय की। अच्छा मसाला था। खबर होती तो खबर लिखता पर वो तो मसाला था, sponserd मसाला। अब पुलिस करे तो क्या करे, बड़े बड़े मामले सुलझा नहीं पा रही है, इस मामले में सी डी तैयार मिल गयी। अनियमितताएं भी रेडीमेड मिल गयीं। बस हो गया काम , जय श्री राम। खबर बनाने के लिए ड्रामेबाजी की ज़रुरत नहीं होती, जज्बा चाहिए होता है, पर जब सब बिकाऊ हो तो उस पर कमेन्ट करना भी शायद मूर्खता होती है, पर सच कहूँ , मुझसे रहा नहीं गया। ख़बरों से दूर ज़रूर हूँ, पर खबरदार हूँ मैं। मेरी थोड़ी सी तैयारियां बच गयी हैं पर बहुत जल्द मैं इन्कलाब लाने की कोशिश फिर करूँगा। ज़िन्दगी और मौत का वो सोचें जिन्होंने अंड बंड कमाई की है और उसे खर्चा करने या बचा कर रखने, या और कमाने की जुगत में जी रहे हैं। नक्सलवाद से बड़ा मिशन है पत्रकारिता। पर जूनून नहीं है, सब दलाल होते जा रहे हैं, हे भगवान् , या मेरे परवर दिगार आप लोग कुछ करोगे या नहीं? चलो मेरे अन्दर ही एक अलख जगाकर उसकी रक्षा करो। जब बुलाना हो बुला लो, पर जीते जी ऐसी दुर्दशा मत करो। आज़ादी अब ज़रूरी हो गयी है।

03 March 2010

नॉन-सेन्स टाइम्स अब नेट पर भी....

अगर इस होली में आप नॉन सेन्स टाइम्स ना पढ़ पाए या देख पायें हो तो आपकी सुविधा के लिए इसे नेट पर भी प्रकाशित कर दिया है। आप अपनी सुविधा के अनुसार लिंक करें।
://www.nonsensetimescg.blogspot.com

24 February 2010

मज़ाक न बन जाएँ छत्तीसगढ़ी फ़िल्में...

light, sound, action...cut.... अब तीसरे दौर में फिर ये आवाजें हमारे यहाँ गूंजने लगी हैं। दो दौर का अनुभव मिला जुला रहा है। अब तीसरा दौर क्रन्तिकारी होना चाहिए था पर फिल्मों का कंटेंट देखकर लग रहा है की पुराने अनुभवों से भी हमने कुछ नहीं सीखा। मैं शुरू से कहता रहा हूँ छत्तीसगढ़िया सीधा सादा होता है, चूतिया नहीं होता। आप फिल्म बनाते समय ये बात क्यों नहीं सोचते कि जितने पैसे में दर्शक ऐश्वर्या रॉय और केटरीना कैफ , अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ को देखता है, आप भी उतने ही पैसे में परदे पर आते हो, तो फिर उतनी मेहनत क्यों नहीं करते। पटकथा से संवाद और फिर शूट से एडिट और रिलीज़ तक उतनी गंभीरता क्यों नहीं। दूसरे दौर में काम चुतियापे नहीं हुए थे। अब फिर वही नौबत आ गयी है, एक शहर में दो -दो छत्तीसगढ़ी फ़िल्में लगा दी गयी हैं। दोनों एक साथ निपटेंगी। आप धैर्य क्यों नहीं रखते। अब तो पूरा कारोबार सस्ता हो गया है। पहले जब रील का खर्चा होता था तब मुंबई के लोग हमसे कहते थे कि कम्प्लीट फिल्म एक जवान लड़की की तरह होती है, जितनी जल्दी हो सके उसे उसके वारिस को सौंप देना चाहिए। अब तो घर की बात है, पर बचकाने दिमागों को कौन समझाए। प्रतिस्पर्धा आप किससे कर रहें हैं ? अपने पड़ोसी से? क्या मज़ाक है।
आज पहली बार मैं आपको बता रहा हूँ की कितनी फ़िल्में बनी हैं हमारे यहाँ। कई का तो आपने नाम भी नहीं सुना होगा। इन फिल्मों के हीरो हीरोइन आज भी दुपहिया वाहनों में घुमते दिखते हैं । तो पैसा कौन कमा रहा है। कौन है शोषक? खैर छोडो। मैं आपको फिल्मों की लिस्ट बता दूँ। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले बनी थीं कहि देबे सन्देश और घर द्वार । राज्य बनते ही सतीश जैन की फिल्म मोर छैयां भुइयां ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता पाई। इसके बाद तो जिसको मौका मिला फ़िल्में बनानी शुरू कर दी, कुछ को सफलता मिली तो कुछ आज तक इस सदमें से उबर नहीं पाए है। छत्तीसगढ़ की पहली धार्मिक फिल्म बनी जय माँ बमलेश्वरी। इसके बाद ये फ़िल्में लगातार बड़े परदे पर पहुँचीं - मयारू भौजी, मोर सपना के राजा, भोला छत्तीसगढ़िया, मया दे दे मया ले ले , मोर संग चलव, संगवारी, मोर संग चल मितवा, बनिहार, पिरीत के जंग, अंगना, भुइयां के भगवान्, नैना, मोर गंवई गाँव, छत्तीसगढ़ महतारी, मोर धरती मैय्या, परदेसी के मया, जय माँ महामाया, तुलसी चौरा, कंगला होगिस मालामाल, अनाड़ी संगवारी, लेड़गा नंबर वन, मोंगरा, संगी, किसान मितान, जरत हे जिया मोर, मितवा। दुसरे दौर में कारी की पूरी मेहनत भी फिल्म का भाग्य नहीं बदल सकी। फ़िल्मी बाज़ार फिर बैठ गया। तीसरे दौर में सतीश जैन की मया ने फिर बॉक्स ऑफिस को गरम कर दिया। फिल्म तो चली विवाद भी चला। हम शुरू से कह रहे थे की ये फिल्म राजश्री फिल्म प्रोडक्शन की "स्वर्ग से सुन्दर " का रीमेक है, पर लोगों ने हमारी बात को गंभीरता से नहीं लिया और बाद में स्क्रिप्ट चोर सतीश जैन को राजश्री वालों ने कोर्ट में घसीट दिया, सतीश जैन मुंबई में रहे हैं , गोविंदा के लिए भी उन्होंने फिल्म लिखी है, फिर ये सब क्यों किया होगा उन्होंने? खूब पैसे कमाने के बाद करीब तीस लाख में राजश्री वालों ने डील फाइनल की। अब छत्तीसगढ़ी दर्शक किस पर भरोसा करें। प्रेम चंद्राकर को जब तक उडीसा के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर मिलते रहे चाँदी रही। दूसरे दौर में उनकी फिल्म ने भी बता दिया की वो कितने पानी में हैं। खैर आज सब व्यस्त हैं। पहले अनुज कहता था की छोटे कैमरे में काम नहीं करूँगा, अब कर रहा है। पूरी फ़िल्में छोटे कैमरे में ही तो बन रहीं हैं। बडबोला पन कहीं खो गया है। अब चुप चाप काम पर ध्यान देना होगा, बाहर से आने वाली हीरोइनों पर ध्यान देने से छत्तीसगढ़िया दर्शक फिर बिदक जायेगा। नवीन लोढ़ा ने पहले भी एक भोजपुरी फिल्म अनाड़ी संगवारी को छत्तीसगढ़ी में पेला था, दर्शकों ने बता दिया कि अनाड़ी वही था। अब वो फिर अनुज कि भोजपुरी फिल्म "मोर करम मोर धरम " को डबिंग करके बाज़ार में है। फिल्म में अनुज के भाग्य ने साथ दिया तो उसकी कई भोजपुरी फिल्मों में ये प्रयोग हो सकता है। फिलहाल बंधना, मोर करम मोर धरम , और वीडियो वर्ल्ड कि एक अजीब से नाम वाली फिल्म में टक्कर चल रही है। भंवर भी तैयार है। सतीश जैन और प्रेम चंद्राकर आने वाले महीने में फिर टकरायेंगे। प्रेम चंद्राकर ने रायपुर के चर्चित पुलिस अधिकारी शशिमोहन को अपनी फिल्म में अनुज का बाप बनाकर उतरा है। अगर फिर भी ये फिल्म नहीं चली तो कौन डरेगा शशिमोहन से? वैसे फिल्म बहुत अच्छी बन रही है। काफी लगन और मेहनत से काम हो रहा है। गोविंदा स्टाइल कि फिल्म रिक्शा वाला टूरा में भिड़े हैं सतीश जैन। भाग्य का खेल कहलाने वाला फ़िल्मी दौर सबका साथ दे। आमीन.......

12 February 2010

हल्दी की कटोरी.....

मेरा बीस महीने का वनवास ख़त्म हो गया। इन महीनों ने अपने सारे राग रंग मुझे दिए। मैंने कई तरह के संत्रास झेले। आत्मविश्वास भी अर्थाभाव के कारण कई बार डोला। इन बुरे दिनों को अपनी पीढ़ी के लिए लिपिबद्ध कर रहा हूँ। इसी आत्मकथा की शीर्षक का नाम का नाम मैंने सोचा है ''हल्दी की कटोरी... " आप लोगों के मनोबल से मैं फिर कई नयी उर्जाओं के साथ लौट आया हूँ। एकदम आखिरी दौर में जब एक दुर्घटना ने मेरा पैर तोड़ने की कोशिश की तब हल्दी की कटोरी हमशा मेरे साथ रही। मेरे तमाम ब्लोगेर्स , ऑरकुट के दोस्तों का मैं आभारी हूँ कि वे उन दिनों भी मेरे साथ लगे रहे जब मुझे आईडी दिखाकर दस रुपये घंटे में नेट पर बैठना पड़ा। मैं पूरी ईमानदारी से आत्मकथा "हल्दी की कटोरी" लिख रहा हूँ । आशा करता हूँ आने वाली पीढ़ी के लिए ये एक प्रेरणादायक सड़क साबित होगी। अब तो लगातार लिखूंगा। मौत का कोई भरोसा नहीं है इसीलिये मैं "हल्दी की कटोरी" को किश्तों में ब्लॉग पर ही लिखकर उसका प्रिंट आउट निकालता रहूँगा। मुझे पढ़ते रहने वालों का एक बार पुनः आभार.......... और हाँ धन्यवाद भी.