05 September 2009

दिल्ली के दलाल, छत्तीसगढ़ के अलाल

इंडिया न्यूज़ के नाम पर वसूली के मामले ने एक बात तो साफ़ कर दी है कि अब दिल्ली के कुछ दलाल और छत्तीसगढ़ के अलाल अब एक हो गए हैं। दिल्ली के पत्रकार जहाँ दिन रात एक करके अपने channel की टी आर पी बढाने और अपने आपको साबित करने की होड़ में लगे हैं वहीँ छत्तीसगढ़ के पत्रकार भी राष्ट्रीय चैनलों में अपनी पैठ बढाने में जुटे हैं। खासकर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण पत्रकार , कई महीनों से तनख्वाह की आस लगाये ये पत्रकार आज भी समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्पर्धा के इस दौर में संवाददाताओं में भी ज़बरदस्त स्पर्धा है।
दिल्ली के दलाल और छत्तीसगढ़ के अलाल पत्रकार आखिरकार सक्रिय हो ही गए। ये पूरा एक गिरोह है। ये लोग सिर्फ़ पैसे वाले लोगों को पत्रकार बनाना चाहते हैं। आज पत्रकारिता और आर टी की नौकरी एक बराबर हो गयी है। आर टी ओ में जाने के लिए एक अघोषित नियम है, उसकी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही सिपाही से लेकर अफ़सर तक की पोस्टिंग की जाती है। इस पूरे खेल में शामिल होते हैं कई दलाल और वो शख्स किसे आर टी ओ में जाना होता है। यही खेल अब पत्रकारिता में भी शुरू हो गया है। अब ये बात अलग है की आर टी ओ से लौटने के बाद उन्हें naxali इलाकों में जाना एक अनिवार्य नियम है। ये जानते हुए भी दिल्ली के कुछ दलाल और छत्तीसगढ़ के कुछ अलालों ने भी हाथ मिला लिया है। कुछ इन दलालों और अलालों की चपेट में भी आकर लुट भी चुके हैं । कुछ अपनी कुर्बानी का इंतज़ार कर रहे हैं । अब चिंतामणि का ही किस्सा ले लें। पिछले कुछ सालों से वो अखबारों से जुड़ा तो था। क्या ज़रूरत थी इलेक्ट्रोनिक मीडिया में चुपचाप आने , लेकिन पता नहीं दलालों और अलालों ने उसे क्या घुट्टी पिलाई, वो कुछ भी मानने को तैयार ही नहीं था। उसे अलाल ने कहा कि channel में काम मिलना आसान नहीं है। पी एस सी से भी ज़्यादा कठिन साक्षात्कार होता है दिल्ली में। पैसा दे दोगे तो कोई साक्षात्कार नहीं होगा, और channel प्रमुख सीधे आपको सारे doccument ख़ुद अपने हाथ से सौंपेंगे। कई दलाल और अलालों कि मिलीभगत का नतीजा ये हुआ कि पत्रकारों के मामले थानों तक पहुँचने लगे हैं। दूसरो को न्याय का भरोसा दिलाने वाले पत्रकार अब ख़ुद न्याय की आस में पुलिस के चक्कर काट रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के लोगों को सीधा सादा और गरीब समझने वाले लोगों को कब अकल आएगी, पानी सर के ऊपर जाने के बाद chhattisgarhiya क्या करेगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। दिल्ली की ये बीमारी chhattisgadhi पत्रकारों के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। पैसा लगाकर पत्रकार बनने वाले लोग न तो समाज का भला करेंगे न देश का। ये तो आर टी ओ में पोस्टिंग के बाद सिर्फ़ अपना पैसा निकालेंगे। इनके शिकार भी कई लोग होंगे। मिशन से कमीशन तक पहुँची पत्रकारिता को पता नहीं ये लोग कहाँ ले जाकर छोडेंगे? पत्रकारिता के इस अभियान को बाजारू बनाने के लिए पता नहीं क्यों लामबंद हो रहे हैं ये लोग? आज हर व्यवसायी या तो अखबार से जुड़ रहा है या पैसा देकर channel का ब्यूरो बनने की फिराक में लगा है, ये लोग एक नया उद्योग स्थापित करने में जुटे हैं, जो बेहद घातक है पत्रकारिता के लिए। पर फिक्र किसे है। जो पत्रकार पत्रकारिता में आने के लिए दिल्ली के संपर्क में हैं उसे अपना भविष्य अन्धकार में दिख रहा है।
आज पत्रकार ख़बरों की चर्चा करते नहीं दिखते, उमके लिए अब टार्गेट मायने रखता है। अब पत्रकारिता जब उद्योग की शक्ल अख्तियार कर रही है तो आओ हम भी पत्रकार लिखने की बजाय अपने आपको उद्योगपति लिखना शुरू करें । इन धन्ना सेठों की ख़बर आज नहीं तो कल ज़रूर बनेगी, मुझे पूरा विश्वास है।
छत्तीसगढ़ में जब से सरकार ने गरीबों को दो रुपये किलो चावल देना शुरू किया है, तब से अलालों का गढ़ होने लगा है छत्तीसगढ़ । काम क्यों करें भला ये लोग। गाँव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं । शहरों का भी यही हाल है। लोग समझ गए हैं आराम और हराम का मतलब। इसी की हवा अलाल पत्रकारों को भी लग गयी है। कौन दिन रात मेहनत करे। किसी को टोपी पहनाओ और चलते बनो। अब इंडिया न्यूज़ के नाम से वसूली करने वाले उद्योगपति ज़रीन का ही मामला लें। छः महीने में उसने वो सब कुछ कर किया , जो कई पत्रकारों के लिए एक सपने जैसा ही है। घर ले लिया , ज़मीन ले ली। घर में नए फर्नीचर ला लिए। ब्लैक & व्हाइट और कलर टी वी हटाकर वहां plazma टी वी लगा लिया। कार खरीद ली। यानी छः महीने में दो तीन लोगों को चुना लगाकर वो बड़ा पत्रकार बन गया। अब तो उसकी दिनचर्या बदल गयी है। दिन भर लोगों से बचकर घूमना , किसी का मोबाइल नहीं उठाना- ये सब उसकी आदत में शुमार हो गया है। अब कैसा करेगा। पुलिस उसके पीछे लग गयी है। अब चाहे उसे ज़मीन बेचना पड़े या makaan , उसे इंडिया न्यूज़ वाला मामला clear करना ही पड़ेगा। जिसकी इज्जत होती है, वो उसे और badhaata है, अब जिसका इज्जत से कोई रिश्ता नाता ही नहीं है, वो यही सब कुछ तो करेगा। दिल्ली के दलालों और छत्तीसगढ़ के अलालों से मैं आखिरी निवेदन कर रहा हूँ । मत करो सरस्वती के साथ मजाक। मत करो के साथ खिलवाड़ । पत्रकारिता को बाजारू मत बनाओ। मत खेलो आग से। इस आगज़नी से ख़ुद तो jhulsoge , साथ में कई लोगों के दिल से निकली आग जलाकर राख कर देगी इस समाज को......

2 comments:

  1. अहफाज़ भाई, बहुत मार्मिक अपील की है आपने आलेख के अंत में , लेकिन जिन लोगों के मुँह में सुविधा का स्वाद लग चुका है क्या वे इसे समझेंगे ? बहरहाल दलाल और अलाल तथा मिशन से कमीशन इन जुमलों का जवाब नहीं । आप अपने मिशन में लगे रहिये ,हमारी दुआयें - शरद कोकास दुर्ग .छ. ग.

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