29 April 2014

बलात्कार……यह शब्द और कृत्य दहला देने वाला है। वैसे तो बलात् होने वाले कार्यों को ही बलात्कार की संज्ञा दी गयी है लेकिन यह कृत्य अमूमन महिलाओं के साथ ही होता आया है और लगातार हो भी रहा है।  इस पर रोक कैसे लगे, बलात्कारियों को कैसे पहचानें और उनकी सज़ा क्या हो ? इस पर कई बार बहस- मुबाहिसे हो चुकीं हैं। अब सवाल यह है कि देश को बलात्कार रहित कैसे बनाएँ ? मुझे व्यक्तिगत रूप से यह लगता है कि बलात्कार एक मानसिक बीमारी है जिसमें शरीर का  इस्तेमाल होता है। किसी महिला को चाहना और उसे न पाने की लालसा में भी आजकल यह कृत्य हो रहा है। महिलायें सुरक्षित कैसे रहें ? यह अब उन्हें सोचना होगा। अंग उघाड़ू कपड़े या अति रुप सज्जा से बचें या इतनी मजबूत रहें कि कोइ उनके साथ ऐसा - वैसा करने की सोच भी न सके। 
बलात्कार की खबर मिलते ही पहले तो मन पसीज जाया करता था। अब तो नक्सली घटना और बलात्कार एक जैसे हो गये हैं। न इसका हल कोई ढूंढना चाहता न इस बारे में कोइ बात करने को तैयार है। नक्सली अपनी मनमर्जी कर रहे हैं और बलात्कारी अपनी। अपना संयम क्यों खोता जा रहा है आदमी।  संतुष्ट क्यों नहीं है आदमी ? बलात्कार भले ही क्षणिक आवेश में हो जाने वाली प्रक्रिया है लेकिन समाज में दोनो की छिछालेदर तो होती ही है। पुरुष भले ही जल्दी सामान्य हो जाये लेकिन महिलाओं के लिये तो यह डूब मारने वाली बात होती है। उठते बैठते उसका दिमाग उलझा रहता है।  खासकर कुंवारी बच्चियां तो सीधे आत्मह्त्या जैसे कदम उठाने को आतुर रहती हैं। ऐसी बच्चियां एकांत ढूंढने लगती और मौन साध लेती हैं। पूरे परिवार में उथल पुथल मच जाती है। मामला छोटे इलाकों का हो तो और भी बात और भी गंभीर हो जाती है। 
बलात्कार के मामले में दोषी कोइ भी हो लेकिन यह एक घृणित कृत्य है और इसकी पाबन्दी पर बात और पहल होनी ही चाहिए। बलात्कार के कुछ मामलों पर युवतियां भी दोषी पायी गयी हैं। समाज उन्हें बख्श देता है। पत्रकार होने के नाते कई मामले मैने भी पढ़े सुने हैं।  एक बात आज तक समझ में नहीं आयी कि युवतियां ऐसा कर कैसे लेतीं हैं ? कुछ तो मजबूरियां रही होंगीं यूँ कोइ बेवफ़ा नहीं होता। पुलिस के पास मैंने कई प्रकरण ऐसे भी देखे हैं जिसमें बच्चा होने के बाद भी बलात्कार की एफ़ आई आर दर्ज हुईं हैं।  अब इसे क्या कहेंगे ? इतनी भोली क्यों होतीं हैं महिलायें कि कोइ भी उन्हें झांसा देकर उसके शरीर से खेल ले। कई मामलों में यह बात भी सामने आई कि युवती ने शादी से इंकार किया तो या तो घमंडी मर्द ने उसका गला घोंट दिया या उसकी आबरु लूट लीं।  किस युग में जी रहे हैं हम ? कुल मिलाकर महिलाओं को "भोग्या" समझना बन्द करना होगा। महिलाओं को भी अपनी हदें पहचाननी होंगी। बलात्कार जैसी घटनाओं से घर , समाज , राज्य और देश सब बदनाम हो रहे हैं। 

23 April 2013

आज से "फ़ीड-सेंटर" भी ......
छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन के दफ़्तर में आज से "फ़ीड-सेंटर" भी शुरू हो जाएगा। इसके लिए तकनीकी तैयारियां पूर्ण हो चुकी हैं। "फ़ीड-सेंटर" शुरू जाने से अब यहाँ के सदस्य यहीं से अपने चैनल के मुख्यालय को सीधे अपनी खबर का ऑडियो-वीडियो भेज सकेंगे। मेल की सुविधा से स्क्रिप्ट अब तक भेजी ही जा रही थी। चिलचिलाती गर्मी से राहत के लिए यहाँ पहले ही इंतज़ाम कर लिए गए थे। अतिशीघ्र (संभवतः मई सप्ताहांत तक) सदस्यों के परिचय पत्र भी उन्हें सौंप दिए जायेंगे। छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों की सक्रियता से यह सब बिना किसी बाहरी सहयोग के संभव हो पाया। सभी को बधाई।

03 September 2012

                                                संगठन ने चेताया- 
अफसरों की मनमानी रोकें
मंत्रालय में तू-तड़ाक शुरूअब जूतम-पैजर की बारी
छत्तीसगढ़ में चल रही अफसरशाही को लेकर अब संगठन ने भी सरकार को चेता दिया है की अफसरों की मनमानी नहीं रुकी तो यही लोग सरकार को ले डूबेंगे. संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों को यहाँ (छत्तीसगढ़) दौरे के दौरान अधिकांश कार्यकर्ताओं ने शिकायत की है की जब अफसर मंत्रियों और सांसदों की नहीं सुन रहे हैं तो कार्यकर्ताओं की कौन सुनेगा. इधर बाहर से शांत
दिखने वाले मंत्रालय के भीतर अब उबाल आने लगा है. दो दिन पहले ही मंत्रालय में पदस्थ दो वरिष्ठ सचिव आपस में भीड़ गए. बात इतनी बढ़ी की एक सचिव ने दुसरे सचिव को साफ़ कह दिया की अब तू सिखाएगा कामकाज. दूसरा भी क्यों शांत रहता उसने भी कहना शुरू कर दिया की तेरे जैसों के कारण ही बाहर से सचिव बुलाने पड़ते हैं. तू अपने काम से काम रख. तू-तू की नौबत काफी देर तक रही और बाकी अफसर एक दूसरे का मुंह ताकते रह गए. जिस तरह से मंत्रालय में आये दिन इस तरह की नौबत आ रही है उससे तो लगता है की आने वाले समय में यहाँ जूतम पैजर की नौबत भी ज़रूर आयेगी.
मंत्रालय के आधिकारिक सूत्र बताते हैं की मंत्रालय के भीतर सचिव स्तर पर ही लोग आपस में खुन्नस निकाल रहे हैं. बात बात पर इनके "अहम्" टकरा रहे हैं और लंबित हो रहे हैं सरकार के कामकाज. अब जब अफसर ही इस तरह की हरकत पर उतारू हों तो बाबुओं को कौन सम्हालेगा? रोज़ किसी न किसी बात पर मंत्रालय में   चिल्ला- चोट हो ही रही है. कोई भी विभाग शान्ति से अपना काम नहीं कर पा रहा. वरिष्ठ अफसर कहते हैं की काम का बोझ अधिक होने के कारण ऐसी हालत होना एक सामान्य प्रक्रिया है. शायद यही कारण हैं की सारे काम वहीँ अटक जा रहे हैं शिकायतें पहुँच रही हैं संगठन तक.
हाल ही में महासमुंद से संगठन ने अपने स्तर पर कार्यकर्ताओं की बैठक का आगाज़ किया. संगठन कुल मिलाकर कार्यकर्ताओं में जोश फूंकने और चुनाव के लिए अपनी तैयारियों को अंजाम देने गाँव -गाँव का दौरा कर रहा है. इस दौरे के बीच लगभग हर जगह संगठन मंत्री सौदान सिंह को सरकार के बारे में विपरीत कमेन्ट ही मिले. कार्यकर्ताओं ने एक सुर से एक ही बात आलापी की किसी भी
कार्यकर्ता की किसी सिफारिश पर कोई फाइल आगे नहीं बढ़ रही. कुछ कार्यकर्ता यह कहने से भी नहीं चुके की जब यहाँ के अफसर हमारे मंत्री और सांसदों की सिफारिश कचरे के डिब्बे में दाल देते हैं तो कार्यकर्ताओं की कौन सुनेगा. संगठन ने इन बातों को गंभीरता से लिया और संगठन मंत्री ने मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह को भी इस बारे में आगाह कर दिया है. संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा है की अफसरशाही पर लगाम ज़रूरी है.

10 March 2012

नरेन्द्र...... तुम्हे सलाम....... दुनिया जैसी चल रही है वैसे ही चलो या मरने को तैयार रहो...


बात सिर्फ मध्यप्रदेश की नहीं पूरे देश की है. हर जगह भ्रष्ट लोग अपना कब्ज़ा जमाकर बैठ गए हैं . हर जगह भ्रष्टाचार. बात बात पर पैसा. जिसके पास पैसा ही उसे छूट है हर अपराध करने की. एक तो पैसे की गर्मी ऊपर से नेताओं का संरक्षण. मध्य प्रदेश के जांबाज़ अफसर नरेंद्र ने जो कुछ किया वह एक इतिहास तो बना गए पर उस बच्चे का क्या कसूर जो उनकी आई. ए. एस. पत्नी की कोख में पल रहा है. अभी तो वह इस दुनिया में आया ही नहीं है. इसी भ्रष्ट समाज में वह अपनी आँखें खोलेगा और जब वह दुनिया के बारे में जानना शुरू करेगा तो कौन बताएगा इस कड़वे सत्य के बारे में. कैसे जियेगा वह अपनी माँ के साथ. बड़ा होकर क्या करेगा.? सरकार कल इसे एक दुर्घटना साबित तो कर लेगी लेकिन क्या अंतरात्मा से यह बात कोई स्वीकार पायेगा की चूक कहीं न कहीं व्यवस्था में है. ऐसे ही मामलों से "वाद" सर उठाता है, जिसके आगे आज भी नतमस्तक है सरकार. फिर घुमते रहो यह बोलते हुए की मुख्यधारा से जुड़ जाओ. नरेंद्र कुमार तो मुख्य धारा से जुडा था, फिर कैसे जान गंवानी पडी उसे.? कुल मिलाकर दुनिया जैसी चल रही है वैसे ही चलो या मरने को तैयार रहो, या फिर एक नया "वाद" तैयार करो और इसके पहले की कोई आपको निपटाने की सोचे खुद निपटा दो उसे.
सवाल सिर्फ एक जान का नहीं है कौड़ी के मोल होती जा रही जान की कीमत का है. सरकार में बैठे लोग अमृत पीकर तो नहीं आये हैं न? किसी की जान का सौदा करने के पहले उन्हें अपने परिवार पर भी एक नज़र डाल लेनी चाहिए. नक्सली वारदातों में सैकड़ों पुलिस अधिकारी मारे गए. आज उनकी खैरियत पूछने वाला कोई नहीं है. केंद्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधि आते हैं और मगरमच्छ के आंसूं बहाकर चले जाते हैं. पुलिस की नौकरी करना क्या अपराध है? वर्दी पहनाकर नंगा करना कहाँ का नियम है.? जितनी पढाई वह वर्दी पहनने के लिए करते हैं उतना कुछ राजनीति में आने के लिए नहीं करना पड़ता. सारी इंटेलीजेंसी घुस जाती है जब राजनीतिज्ञों के इशारों पर कुचल दिए जाते हैं पुलिस के जवान या अधिकारी. आज नरेंद्र चला गया कल कोई और सूली चढ़ जायेगा. सरकार का कुछ नहीं जाता . जाता है सिर्फ परिवार का.
मन सिहर जाता जाता है यह सोचकर की नरेन्द्र की धर्मपत्नी ने ही उन्हें मुखाग्नि दी. उनके पेट में पल रहे नन्हे मेहमान ने क्या अपनी माँ के पेट में लात नहीं चलाई चलाई होगी? क्या गुजर रही होगी उस महान औरत पर जो सारी बातें जानती थी, खुद हौसला अफजाई करती रही अपने आई पी एस पति की. अंजाम इतना गंदा होगा शायद इस दंपत्ति ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा. अवैध खनन हर प्रदेश में हो रहा है, कारवाई न होना खुद साबित कर देता है की मामला मिली जुली सरकार का है. आज चिंतन की सख्त ज़रुरत है. अगर आज भी हम सचेत नहीं हुए तो देश में बढ़ रहा गुस्सा पता नहीं किस मुकाम पर जाकर ख़त्म होगा. नेताओं को सरे आम पीटने लगेगी जनता.. ..इनको बचाने जो आएगा वह भी शिकार होगा जनता के इस महा अभियान का. एक "वाद" से तो सरकार निपट नहीं पा रही है अगर कोई दूसरा वाद अस्तित्व में आ गया तो क्या होगा नेतागिरी की आड़ में भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था का. चिंतन मनन आवश्यक है. आइये सब मिलकर सोचें और हल निकालें एक सद चरित्र समाज का.

28 February 2012

अखबारों के लिए आबंटित ज़मीन का उपयोग सिर्फ प्रकाशन के लिए

रायपुर. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को धता बताने वाले अखबार मालिक अब खुद एक ऐसे नियम में फंस गए हैं जिससे अब उन्हें कोई बचा ही नहीं सकता. नियम यह है की अखबारों के लिए आबंटित ज़मीन का दूसरा उपयोग किया ही नहीं जा सकता. २००७ में यह नियम खुद कलेक्टर ने बनाया था. इस निर्देश में एक बात और साफ़ तौर पर कही गयी है की शर्तों का अनुपालन नहीं होने पर ज़िलाधीश भी अचानक निरीक्षण कर कार्यवाही कर सकते हैं.शासन के प्रतिनिधि, अधिकृत व्यक्ति तथा अधिकृत प्रतिनिधि शर्तों के पालन के लिए अधिकृत किये गए हैं. नियम- कायदों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाने वाले अखबार मालिकों पर आखिर कब और कौन करेगा अधिकृत कार्यवाही? एक अखबार को हाल ही में तगड़ा जुर्माना पटाना पड़ा है. इस चर्चित अखबार द्वारा जुर्माना तो पटा दिया गया है, लेकिन आजू बाजू के अखबार मालिक इस कार्रवाई से अनभिज्ञ और अनजान हैं.
सूत्रों की मानें तो सरकारी कागज़ात में एकदम साफ़ तौर पर कहा गया है की "भूमि का उपयोग अन्य उपयोग के लिए नहीं होगा " . अगर इस नियम का उल्लंघन हुआ तो उस परिसर को अनाधिकृत कब्जेदार मानकर वह भूमि शासन में निहित कर ली जायेगी. इस भूमि का पूर्ण बाज़ार मूल्य पेनाल्टी के साथ भी लिया जायेगा. सूत्र बताते हैं की एक अखबार को अधिग्रहित करने की योजना बन चुकी है. इस पर अमलीजामा कभी भी पहनाया जा सकता है. सरकार और जिला प्रशासन की इस संयुक्त कार्यवाही से फर्जीवाड़ा करने वाले अख़बार मालिकों की नींद हराम हो गयी है. एक अखबार को तगड़ा जुर्माना और दूसरे को राजसात करने की तैय्यारी काबिल- ए- तारीफ़ है. इस तरह की कार्यवाही से चौथे स्तम्भ के हित चिंतकों का मनोबल बढ़ेगा.
चौथे स्तम्भ की वकालत करने वाले पत्रकारों का समूह अब इस मुहिम से जुड़ने लगा है. मुख्यमंत्री के आसपास झूमे रहने वाले पत्रकारों की संख्या भी अब कम होने लगी है. इस मुहिम ने सबको चेता दिया है की असली कौन है और नकली कौन है. अब इस बात का भेद भी खुलने लगा है की पत्रकारों के संगठन को कमज़ोर कर उसे नेस्तनाबूत करने वालों का गिरोह भी अखबार मालिकों की चौकड़ी में शामिल था. पत्रकारों को संघ से दूर रखकर और संगठन के चुनाव न करवाना भी इसी महा घोटाले का एक अभिन्न अंग था. बहरहाल समय हमेशा एक सा नहीं रहता . देर से ही सही लेकिन अगर हमारी इस मुहिम का असर हुआ तो कई सफेदपोश लोग बेनकाब होंगे जो आज पानी के मोल मिली ज़मीन का करोड़ों में दोहन कर रहे हैं. एक अखबार समूह तो "समर्पण" के मूड में आ गया है.

26 July 2011

नारायण नारायण.. तुम्हें तो फाँसी पर लटका देना चाहिए.

.....................सच कह रहा हूँ. पत्रकारों को घुमाने के नाम पर तुमने लाखों रुपये हड़प लिए? पुलिस के शरीफ अफसरों के खिलाफ तुमने कलम उठाई ? लड़ते हो पत्रकारों के लिए? जिनके मालिक ख़ुद सरकार से मिलें हुए हैं. वो पत्रकार जो तलुए चाट- चाट कर अपना वजूद बनाये हुए हैं? धिक्कार है तुम पर..तुम्हें शायद पता नहीं है आज सबके सुर में सुर मिलाने वाले को ही पत्रकार कहा जाता है. जेल से बाहर आकर मुख्यमंत्री के आसपास घूमने वालों से आप पत्रकारिता सीखो. सोचता था जेल आकर आपको समझाता, पर वहाँ भी बंदिश कर दी गयी है. ऐसा क्यों हो रहा है आपको पता है? सरकार वो ही लोग चला रहे हैं जो इसके पहले वाली सरकार चला रहे थे. डंडा भी उन्हीं के हाथ में है. जो लाल बत्तियों में घूम रहे हैं-उनकी पोल पट्टी भी है इनके पास. बंद कर दो लिखना. आप जिनके खिलाफ लिख रहे हो क्या आम लोगों को उनके बारे में पता नहीं है? ये इतने स्वामी भक्त होते ,ईमानदार होते , सरकार का भला चाहते. या अपने आपको अच्छा साबित करना चाहते तो सबसे पहले अपनी पोस्टिंग नक्सली इलाकों में करवाते. राज्य का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का मामला तो वहीं है. पर ये ऐसा नहीं करेंगे. शहर में रहकर जितनी ऐय्याशी कि जा सकतीं है, उतना मजा जंगली इलाकों में कहाँ है. आपको तो मैं समझदार समझता था. मुझे लगता था कि आपको पता होगा कि इन्ही अफसरों के भरोसे सरकार चलाना मजबूरी है. इन्ही अफसरों ने सारे आम हाथ पैर तोड़ा था इन्ही के एक बड़े नेता का. मजबूरी क्या नहीं कराती- अपने आपको बचाने के लिए क्या बढ़िया गेम खेला इन लोगों ने. जिन पत्रकारों को एक सिंगल ख़बर बनाना नहीं आता , उन्हें पत्रकार नेता बताकर आपके खिलाफ इस्तेमाल कर लिया. आप फँस गए. भुगतेगा कौन? आपके घर वाले. क्योंकि आपने ऐसा अनर्थ कर दिया है जिसके लिए ये सज़ा काफी है ही नहीं. रही बात फर्जी पत्रकार की. पूरे राज्य के प्रेस क्लब की हालत देख लो. पूरा फर्जीवाड़ा तो यहाँ है. यहाँ हाथ क्यों नहीं डालती पुलिस? उन्हें पता है यहाँ के लोग कम से कम तीन मंत्रियों का पैर पड़ते ज़रूर दिख जाते हैं. और हाँ शरीफ अफसरों के खिलाफ ना लिखते ना बोलते. चल रही है दुकान. रायपुर और बिलासपुर के पत्रकारों को कितनी बार तो नपुंसक लिख चुका. अब लगता है कि साबित भी करना ही पड़ेगा.


क्यों लिखा आपने उन अफसरों के खिलाफ ? मैं भी नाराज हूँ . अरे समय का इंतज़ार करो ना. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी? आप जबरदस्ती हीरो क्यों बनना चाह रहे थे. सबको पता है कि पत्रकारों को घुमाने के लिए जो चेक जारी हुआ है वो नमन एविअशन के नाम पर है. आपका कोई रोल वहाँ नहीं है. अब आप ख़ुद पता करो ये नमन नाम से कौन सरकार को नमन किए जा रहा है. आप से अच्छे तो आपके खिलाफ रिपोर्टें लिखाने वाले लोग हैं जो सरकारी खर्चे से विदेश भी घूम आए. विदेशी बालाओं से खूब सारी पप्पी- शप्पी भी खुले आम की. बंद कमरों में क्या हुआ ये कोई आज तक बता नहीं पाया. बहरहाल आप नेतगिरी बंद कर दो. अब इंतज़ार करो अपने समय का. मैं भी अभी बैड रेस्ट पर ही हूँ. पर दिल है कि मानता नहीं. जान जली तो लिखने बैठ गया. आकर नियम पढ़ो कि वेब पर क्या लिखना है कैसे लिखना है. अफसरों के खिलाफ सीधे नहीं लड़ना है. आपने ही बताया था कि एक अफसर ने किस चीज कि पेशकश अपने मामले को छुपाने के लिए की है. ईश्वर नाम की कोई चीज है कि नहीं? मैंने देखा है ईश्वर को क़रीब से. आप उसके न्यायालय में ये मामला छोड़कर तो देखिये. वहाँ देर है पर अंधेर नहीं. जो नीचे कि दुनिया में अपने आपको तुर्रम खान समझ बैठे हैं उन्हें याद रखना चाहिए- तानाशाही का हमारे यहाँ ज़्यादा लंबा टॉप -अप नहीं मिलता. सब जायेंगे दो कौड़ी के भाव. क्योंकि पुलिस वाले जानते हैं कि वो ईश्वर है, पर ईश्वर को नहीं पता कि वो पुलिस वाला है. वहाँ फ़ैसला कर्म के आधार पर ही होता है,. कर्म ऊपर वाले से ज़्यादा दिन छुपाये नहीं जा सकते. नीचे के पत्रकार भले अपनी रोजी रोटी या प्रलोभन के कोई समझौता कर लें, ईश्वर के दरबार में सबकी पेशी तय है.

30 March 2011

300 का मोमेंटो...फिल्म स्टार्स के साथ फोटो.....

 आज तक हम  babylon का नाम सुनते थे, abylon का 
नाम पहली बार सुना. आप सोचेंगे की वाकई में ये abylon  क्या  है? अरे इसी नाम से तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों के अवार्ड बंटे.
एक दैनिक अखबार,  जो राजेश शर्मा के चक्कर में बंद हो गया था. अब वो मासिक हो गया है. उसी को लांच करने के लिए तो फ़िल्मी कलाकारों का इस्तेमाल किया गया. छत्तीसगढ़िया लोग तो इस्तेमाल के ही लिए बने  हैं न? एक  फिल्म निर्माता को भी आगे आना था..उसी ने पैसा भी लगा दिया. क्या चल रहा है छत्तीसगढ़ में? चार चवन्नी भर पत्रकार जिन्हें खुद कुछ आता जाता नहीं है, उन लोगों की जूरी बना दी गयी. उन्ही लोगों ने अपने सम्पादक की नज़र में चढ़ने के लिए उन्हें आमंत्रित कर  लिया और हो गया "सिने अवार्ड".. वाह ये क्या बात हुई. आज की तारीख में प्रेम चंद्राकर और सतीश जैन के योगदान को आप भुला नहीं सकते, उनकी गैर मौजूदगी में ही हो गया ये आयोजन. राजेश शर्मा से धोखा खाने के बाद अब हमारे यहाँ के मंत्री थोड़ा परहेज करने लगे हैं,  बुलाया तो उन्हें भी गया था. अब बताइये न कार्ड छपा न कोई एस एम् एस हुआ. बस चार लोगों ने तय कर लिया और अपने हिसाब से पूरा प्रोग्राम तय हो गया. न किसी वरिष्ठ से राय ली न उन्हें कुछ बताया, बस हो गया आयोजन. छत्तीसगढ़ के कलाकार क्या वृहन्नला हैं जिन्हें छट्ठी- छल्ले के नाम पर कहीं भी नचवा लो.,
कुछ मजेदार किस्से सुनिए.. रवि अग्रवाल को यहाँ यह कहकर सम्मानित किया गया की HDV. की खोज उसने की है. अगर ये बात HDV  का निर्माण करने वाली कंपनी को हो गयी तो? (इस सन्दर्भ में रवि ने आपत्ति करते हुए मुझे इस आयोजन के वीडिओ फूटेज का हवाला देते कहा है की छत्तीसगढ़ में एच.डी.वी. पर पहली फिल्म बनाने के लिए उसे सम्मानित किया गया है. मैं रवि को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ. उर्जा और प्रतिभा उसमें कूट - कूट कर भरी है. दरअसल रवि और मैं एक ही ग्रह के सताए हुए हैं. हम अपने वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं. कोई हमें इस्तेमाल न कर ले.., यही सोच सोच कर हम डरते हैं और वो डर सच का दामन पकड़कर हमेशा हमारे सामने खड़ा हो ही जाता है. अंतर्मुखी  व्यक्तित्व   होने के कारण हम दोनों में कई समानताएं हैं.) "बिदाई" फिल्म में पार्श्व  गायन के लिए अलका चंद्राकर को सम्मानित किया गया और वहां छाया चंद्राकर की आवाज़ वाला गाना " डेहरी ला लांघ के जाबे वो बेटी"  .. चलता रहा. मनमोहन को जिस फिल्म " टूरी नंबर ०१"  के लिए बेस्ट विलेन का अवार्ड मिला उसमें वो सहायक विलेन था. पुष्पेन्द्र सिंह इस फिल्म में विलेन थे.  कॉमेडी उस समय भी हुई जब बेस्ट कॉमेडियन की दौड़ में शामिल क्षमानिधि मिश्रा को अतिथि बनाकर मंच पर बुलाया गया और उन्ही के हाथों सवश्रेष्ठ कॉमेडियन का अवार्ड हेमलाल को  दिलवाया गया. मुकेश  वाधवानी और मनोज वर्मा की पूरे आयोजन में चली. जो लोग इन बड़ी बातों को यह कहकर टाल रहे हैं की चलो शुरुआत तो हुई, मैं उनमें से नहीं हूँ. आपको ये सब जानकर हैरानी नहीं हो रही है?  शुरुआत तो राजेश शर्मा ने भी की थी.,  आज वो भगोड़ा है, दरअसल एक दैनिक अखबार , जो राजेश शर्मा के कारण बंद हो गया था , उसे मासिक बनाकर शुरू करने के लिए ये षड़यंत्र रचा गया. षड्यंत्रकारी जानते थे कलाकार सम्मान का भूखा होता है. मिटा दी भूख उसकी. अनुज को छोड़कर सारे पुरस्कारों पर मुझे व्यक्तिगत आपत्ति है, चार लोग मिलकर छत्तीसगढ़ के कलाकारों का निर्धारण नहीं कर सकते. एक अखबार अब अपनी गलतियाँ सुधार रहा है. गलती सुधारी जा सकती है, लेकिन इस तरह के आयोजन से कलाकारों की छवि धूमिल तो होगी ही. अब आप भी अपने गाँव में ऐसे आयोजन करवाएं और सम्मान के चक्कर में देखिये कैसे दौड़े आते है कलाकार ?