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03 May 2009
प्रेम साइमन नहीं रहे..
छत्तीसगढ़ की पहचान और यहाँ की आतंरिक आग को सही मायनों में समझने और उन्हें आकृति देने वाले प्रेम साइमन ने भी आज हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं। आज ही उनका अन्तिम संस्कार भी कर दिया गया। साइमन जी के कई नाटकों , विडियो फिल्मों और फिल्मों में मुझे जुड़ने का सौभाग्य मिला। उनके संवादों में आग दिखती थी। ६ माह पहले उन्होंने मुझसे मेरा एक गाना हमर छत्तीसगढ़ माँगा था। वो उसे अपने मंचीय प्रस्तुतियों में दिखाना चाहते थे। उनके नाटकों, विडियो फिल्मों और फीचर फिल्मों के नाम , किरदार और संवाद आम आदमी को झकझोर देने के लिए काफ़ी थे। हिन्दी नाटकों में अंधेरे के उस पार, मुर्गीवाला, विरोध, हम क्यों नहीं गाते, राजा जिंदा है, अरण्य गाथा , chhattisgarhee नाटकों में घर कहाँ है, कारी, लोरिक चंदा, हरेली, दस्मत कैना, हरेली , गम्मतिहा, वीडियो फिल्मों में चिह्न, मयारुक चंदा, कसक, कोसल गाथा, फीचर फिल्मों में परदेसी के मया, कारी, रघुवीर में उनकी लेखनी का जादू सबने देखा ही है। शकल सूरत और स्वभाव से सरल और सादगी ओढे रहने वाले साइमन जी के चले जाने से छत्तीसगढ़ का कला जगत अपने आपको अनाथ महसूस कर रहा है। इश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे और हमें शक्ति ......
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