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26 July 2011

नारायण नारायण.. तुम्हें तो फाँसी पर लटका देना चाहिए.

.....................सच कह रहा हूँ. पत्रकारों को घुमाने के नाम पर तुमने लाखों रुपये हड़प लिए? पुलिस के शरीफ अफसरों के खिलाफ तुमने कलम उठाई ? लड़ते हो पत्रकारों के लिए? जिनके मालिक ख़ुद सरकार से मिलें हुए हैं. वो पत्रकार जो तलुए चाट- चाट कर अपना वजूद बनाये हुए हैं? धिक्कार है तुम पर..तुम्हें शायद पता नहीं है आज सबके सुर में सुर मिलाने वाले को ही पत्रकार कहा जाता है. जेल से बाहर आकर मुख्यमंत्री के आसपास घूमने वालों से आप पत्रकारिता सीखो. सोचता था जेल आकर आपको समझाता, पर वहाँ भी बंदिश कर दी गयी है. ऐसा क्यों हो रहा है आपको पता है? सरकार वो ही लोग चला रहे हैं जो इसके पहले वाली सरकार चला रहे थे. डंडा भी उन्हीं के हाथ में है. जो लाल बत्तियों में घूम रहे हैं-उनकी पोल पट्टी भी है इनके पास. बंद कर दो लिखना. आप जिनके खिलाफ लिख रहे हो क्या आम लोगों को उनके बारे में पता नहीं है? ये इतने स्वामी भक्त होते ,ईमानदार होते , सरकार का भला चाहते. या अपने आपको अच्छा साबित करना चाहते तो सबसे पहले अपनी पोस्टिंग नक्सली इलाकों में करवाते. राज्य का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का मामला तो वहीं है. पर ये ऐसा नहीं करेंगे. शहर में रहकर जितनी ऐय्याशी कि जा सकतीं है, उतना मजा जंगली इलाकों में कहाँ है. आपको तो मैं समझदार समझता था. मुझे लगता था कि आपको पता होगा कि इन्ही अफसरों के भरोसे सरकार चलाना मजबूरी है. इन्ही अफसरों ने सारे आम हाथ पैर तोड़ा था इन्ही के एक बड़े नेता का. मजबूरी क्या नहीं कराती- अपने आपको बचाने के लिए क्या बढ़िया गेम खेला इन लोगों ने. जिन पत्रकारों को एक सिंगल ख़बर बनाना नहीं आता , उन्हें पत्रकार नेता बताकर आपके खिलाफ इस्तेमाल कर लिया. आप फँस गए. भुगतेगा कौन? आपके घर वाले. क्योंकि आपने ऐसा अनर्थ कर दिया है जिसके लिए ये सज़ा काफी है ही नहीं. रही बात फर्जी पत्रकार की. पूरे राज्य के प्रेस क्लब की हालत देख लो. पूरा फर्जीवाड़ा तो यहाँ है. यहाँ हाथ क्यों नहीं डालती पुलिस? उन्हें पता है यहाँ के लोग कम से कम तीन मंत्रियों का पैर पड़ते ज़रूर दिख जाते हैं. और हाँ शरीफ अफसरों के खिलाफ ना लिखते ना बोलते. चल रही है दुकान. रायपुर और बिलासपुर के पत्रकारों को कितनी बार तो नपुंसक लिख चुका. अब लगता है कि साबित भी करना ही पड़ेगा.


क्यों लिखा आपने उन अफसरों के खिलाफ ? मैं भी नाराज हूँ . अरे समय का इंतज़ार करो ना. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी? आप जबरदस्ती हीरो क्यों बनना चाह रहे थे. सबको पता है कि पत्रकारों को घुमाने के लिए जो चेक जारी हुआ है वो नमन एविअशन के नाम पर है. आपका कोई रोल वहाँ नहीं है. अब आप ख़ुद पता करो ये नमन नाम से कौन सरकार को नमन किए जा रहा है. आप से अच्छे तो आपके खिलाफ रिपोर्टें लिखाने वाले लोग हैं जो सरकारी खर्चे से विदेश भी घूम आए. विदेशी बालाओं से खूब सारी पप्पी- शप्पी भी खुले आम की. बंद कमरों में क्या हुआ ये कोई आज तक बता नहीं पाया. बहरहाल आप नेतगिरी बंद कर दो. अब इंतज़ार करो अपने समय का. मैं भी अभी बैड रेस्ट पर ही हूँ. पर दिल है कि मानता नहीं. जान जली तो लिखने बैठ गया. आकर नियम पढ़ो कि वेब पर क्या लिखना है कैसे लिखना है. अफसरों के खिलाफ सीधे नहीं लड़ना है. आपने ही बताया था कि एक अफसर ने किस चीज कि पेशकश अपने मामले को छुपाने के लिए की है. ईश्वर नाम की कोई चीज है कि नहीं? मैंने देखा है ईश्वर को क़रीब से. आप उसके न्यायालय में ये मामला छोड़कर तो देखिये. वहाँ देर है पर अंधेर नहीं. जो नीचे कि दुनिया में अपने आपको तुर्रम खान समझ बैठे हैं उन्हें याद रखना चाहिए- तानाशाही का हमारे यहाँ ज़्यादा लंबा टॉप -अप नहीं मिलता. सब जायेंगे दो कौड़ी के भाव. क्योंकि पुलिस वाले जानते हैं कि वो ईश्वर है, पर ईश्वर को नहीं पता कि वो पुलिस वाला है. वहाँ फ़ैसला कर्म के आधार पर ही होता है,. कर्म ऊपर वाले से ज़्यादा दिन छुपाये नहीं जा सकते. नीचे के पत्रकार भले अपनी रोजी रोटी या प्रलोभन के कोई समझौता कर लें, ईश्वर के दरबार में सबकी पेशी तय है.

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